Saturday, June 17, 2023

सुबह की चाय मीठी होनी चाहिए।

सुबह की चाय मीठी होनी चाहिए। रात की कड़वाहट घुल जाती हैं। 
बेड टी की आदत महीनो पहले छूट चुकी थी। अब चाय की याद भी मुश्किल से आती थी। 
उन दिनों वह जहां रह रहा था वहां चाय की जगह उबले पानी में कुछ पहाड़ी जड़ी बूटियों को डाल एक शक्तिशाली पेय से दिन की शुरुआत होती थी।
 दुकान चलाने वाली महिला उसे दुकान में घुसते देख हंसती थी, शायद वह इस पेय को चाय समझ कर पीता था इसलिए। 
उसकी आवाज मुश्किल से उनलोगो ने सुना होगा और उन्हें ऐसा लगता था कि वह गूंगा हैं। इशारों इशारों में लेन– देन होता था।
एक सुबह नारियल के पेड़ वाली उस दुकान में घुसते ही हंसने और उसे लक्ष्य कर बोली गई बात सुनाई दी। 
यहाँ स्वर्गबाट ​​निर्वासित देवता आउनुहुन्छ। (लो आ गए स्वर्ग का कोई निर्वासित देवता) 
उनकी बातें सुन वह भी मुस्कुरा पड़ा था। वह थोड़ी बहुत यह भाषा समझता था,पर उन्हें लगता था कि उसे इसकी समझ नही।  शायद उसके लिए यह सबसे सटीक पहचान थी। 
एक खूबसूरत दिल जिसने कभी किसी को पीड़ा नही पहुचाई होगी, आज खुद पीड़े में था।
वक्त की साजिशे देख ऐसा लगता था कि सजा का ये सिलसिला कभी खत्म ही नही होगा। संभलने की कोशिसे करता और फिर से गिरा दिया जाता। 
कौन सोच सकता था कि एक हंसता बोलता लड़का यू खामोश हो जायेगा। सबकुछ बदल जायेगा और ऐसा बदलेगा की पहचान का कोई सिरा नजर नहीं आएगा। 
दोपहर की तरह निर्जीवता सुबह से ही उसके आस पास जमा हो जाती थी। 
कम आबादी वाले उन क्षेत्रों में हवाओं का शोर ही एक जाना पहचाना था। कुछ ऐसा था जिसे वह कस कर पकड़े रहता।  हवाओं को ले जाने नही देना चाहता था।  मगर वक्त के साथ चलने वाली ये हवा बलवान था। रोज कुछ ना कुछ छीन ही ले जाता और बदले में दुख सहने खातीर आंसू दे जाता था। 
खिड़की से दूर एक सुनसान रास्ता दिखाता था जो अक्सर तन्हाइयों से लिपटे मिलता था। वह रोज उस जगह जाने का सोचता। 
वह एक शाम थी और बुझती जा रही रौशनी में घुंघलका पसरा था। चुप्पी थी और चंद शक्ले आ जा रही थी। वह उस रास्ते पर बढ़ता जा रहा था। रास्ते की पहचान को लेकर कोई जिज्ञासा नही थी। 
वह सुबह होने तक उन रास्तों पर फिरता रहा था। ना रास्ते ने कुछ बोला ना उसने कुछ पूछा।  कई सवाल थे पूछने को मगर रास्ता उसके तरफ से उदासीन ही बना रहा। 
शायद रास्ता उससे ज्यादा अकेला था। उनकी राह ताकते ताकते जो इन्हीं रास्तों से होकर गुजरे मगर फिर वापस नही लौटे। 
जो वक्त के साथ बदलते नही उन्हें वक्त अकेला छोड़ आगे बढ़ जाता हैं। 
ये उदासी पुरानी हैं। 
घुटन, बेबसी, चोट, और खोते जाने के बाद ऐसी ही उदासी पसर जाती है। 
संवाद जैसे बर्फ की तरह जम जाते हैं। कैसे पिघलेंगे मालूम नही। अवचेतन की भाषा हमें करीब लाती हैं।  थोड़ी देर बाद हम उन्ही रास्तों पर बढ़ जाते है जो एक दूजे से दूर ले जाता है। उन दोनों के बीच  एक भाषा थी जो निर्जीव हो चुकी थी। 
राह किनारे कुछ पेड़ ठंड के ठिठुरन में बर्फ का चादर ओढ़े खड़े थे। सहमे से। 
 कई बातें  पेड़ से कहना–सुनना चाहता था अगर वे बोल सुन सकते तो। 
बचपन में सुना और पढ़ा था कि जिन पहाड़ों पर सबसे ज्यादा ठंड पड़ती है वह जगह प्रेतात्माओ का पसंदीदा जगह होता हैं। वे उधर रहते हैं।
उन दिनों डर भी नहीं लगता था। देर रात तक भटकता रहता था।
यह सुबह के ठीक पहले वाली घनी अंधेरी रात थी।  जब रास्ते भी चिड्डियो की आवाजे सुन जगने लगे थे। 
 भीतर का अंधेरा और बाहर पसरी अंधेरा मिलकर एक रौशनी का निर्माण कर रहे थे। 
शायद कल का आसमान सूरज से सुसज्जित होगा। धूप खिलेगा। 
यह विदा हो रहा मौसम, रोज अपना कुछ निशान छोड़ता जा रहा था। शायद यह हमेशा के लिए मेरे से दूर जा रहा था।

वह रेगिस्तान था रेगिस्तान ही रहा

वह रेगिस्तान था रेगिस्तान ही रहा। लोग आते रहे, कदमों के निशान बनते रहे और आंधियां निशान मिटाती रही। 
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वह एक पहाड़ी लड़का था तो पहाड़ी लोककथा और लोकगीत सुनते हुए बड़ा हुआ था। सपने भी उसे हरा–भरा और रोमांच वाले ही आते थे। 
लेकिन अक्ल का दांत टूटते ही उसके सपने, दुस्वप्न में बदल चुके थे। सपनों का ऐसा डर की रात में सोने से डर लगे। नींद की गोलियों के असर से सपने रात भर के लिए सप्रेस्ड तो हो जाते थे लेकिन होश आने पर, दिन की रौशनी में उसकी काली परछाई चारों तरफ से घेरे  रहती। 
वर्षो बाद उसे फिर से वही दुस्वप्न दिखने लगे थे।
उसे ताज्जुब हो रहा था कि उसका जीना नया हैं, कर्म नया हैं और कर्म का कोई अतीत भी नही होता, फिर भी वर्षो बाद वही दुस्वप्न आ रहे हैं।  
वह एक पहाड़ की आसान सी चढ़ाई पर चढ़ रहा हैं। यह सूर्यास्त से ठीक पहले का समय है। पहाड़ की चोटी गाढ़ी रौशनी से नहाई हुई हैं। यह रौशनी डरावनी रूप में उसकी तरफ बढ़ रही है। पहाड़ की तलहटी में पानी की ठहरी हुई एक झील हैं, जो अस्त हो रहे सूरज के रंगों से झिलमिला रहीं हैं। अचानक अंधेरा हो जाता हैं। पहाड़ जीवन सा धड़कने लगता हैं। उसके नीचे की जमीन सागर की लहरों की तरह उछल रही हैं।  पैर उखड़ने लगते हैं। वह एक ऐसी झील में गिर रहा हैं  जिसका पानी काला हैं। फिर कुछ बचता नही सिवाय काली अंधेरों के सिवा। 
पहली बार जब ये दुस्वप्न दिखने शुरू हुए थे तो किसी ने सलाह दी थी कि पहाड़ की जगह रेगिस्तान की कल्पना किया करो। सपने आने बंद हो जाएंगे।
कल्पना के लिए वो रेगिस्तान की यात्रा पर था।
 पहाड़ पर पाला बढ़ा उसके अनुभव में सिर्फ हरियाली – फूलों की खुशबू और चिड़ियों की चहक थी। 
लेकिन रेगिस्तान को देख उसे पहली बार अनुभव हुआ की बिना चिड़ियों का आकाश कितना सुना लगता हैं। बिना चिड़ियों का आकाश नही होना चाहिए। 
विशाल खालीपन समेटे यह रेगिस्तान खुद अपने ताप में रोज झुलसता था। सैलानी आते थे, चहलकदमी करते थे, कदमों के निशान बनाते थे, रेत पर लेट कर पिक्चर लेते थे फिर खुद पर चिपक आए रेत को झाड़ चल देते थे। सैलानियों से भरे होने के वावजूद भी रेगिस्तान का अकेलापन स्थाई था। अकेलापन अकेले जीना पड़ता हैं कोई चाह कर भी बांट नही सकता। 
" क्या तुम्हे बुरा नही लगता"– उस लड़के ने रेत पर लेटे रेत से सवाल किया था।
जवाब में रेत ठहरी नजरो से देखा भर था। सुखी और कठोर आंखों में एक शैतानी चमक थी जो किसी को भी डरा सकता था।  
लड़के के अंदर और सवाल करने की हिम्मत नही बची थी।
रेत में सर टिकाए लड़का सोच रहा था – जिससे एक–एक कर  सब छीना जा रहा हो– उसका ‘मैं’, सुंदरता, मुस्कुराहट, पानी, हरियाली और गौरवपूर्ण अतीत– उस मरे हुए रूह में शैतान का घर होता हैं। उसका सख्त और क्रूर होना लाज़िमी हैं।
साल में एकाध बार रेगिस्तान विशाल महलों वाले गौरवपूर्ण अतीत को याद कर आंसू जरूर बहाता था। लेकिन हर आंसू उसे और मायावी और क्रूर बनाते थे। 
किसी भटक गए राहगीर को गलत रास्ता दिखाता। प्यासे को दूर सामने चमकीला झील होने का भ्रम देता और प्यासे के वहा पहुंचते ही रेत शैतानी ठहाके लगा, प्यासे को गोल गोल तब तक घुमाता जब तक प्यास से उसकी मृत्यु न हो जाती। 
कहावतों में प्रचलित था कि रेगिस्तान पर कभी भरोसा नहीं करना। यह मायावी और कठोर होता हैं।  इसे जादू टोना आता है। 
लेकिन क्या हमेशा से रेगिस्तान ऐसा ही था? हरगिज नही! गहरा समुंद्र हुआ करता था। लोग अपने फायदे के लिए समुंद्र को रेगिस्तान बना डाले और अब रेत से खेलने आते हैं। 
वह पहाड़ी लड़का अब शांत था। 
रात घिर आई थी। रेगिस्तान उस पहाड़ी लड़के के प्रति थोड़ा शीतल हो चला था। उसे अपना रहा था। कई रातों का जगा वह नींद के आगोश में था। 
 सपने फिर भी आए थे – सामने रेगिस्तान था , तुफानों के बवंडर में नाचता लड़के को भी अपने में समेट रहा था। दम घुटने लगे थे। उसे प्यास लगी थी। प्यास की महीन डोर गले को कस रही थी।  पानी की खोज में वो लड़का रेगिस्तान के अंदर तक घंसता जा रहा था। 
@अविनाश पाण्डेय

Monday, February 20, 2023

मातृभाषा दिवस

मैं तब पूरी तरह एथेस्ट बन चुका था। मेरी भाषा उनकी भाषा इन सब से ऊपर उठ चुका था। ( ऐसा मेरा मानना था।) 
 इंग्लिश लाइफ स्टाइल, इंग्लिश गाने, इंग्लिश इमोशंस वाली एटीट्यूड आदि मेरे अंदर रच बस चुके थे। 
लेकिन वे पल जिसमे मृत्यु मेरे करीब थी,  बेहोशी में बुदबुदाने, दर्द से चीखने वाले शब्द मातृभाषा से आए थे। 
नदियां के पार और हम आपके हैं कौन, दोनो एक ही प्रॉडक्शन की एक ही कहानी पर आधारित फिल्में हैं। लेकिन इमोशन के स्केल पर भोजपुरी भाषी नदिया के पार देख कर ज्यादा इमोशनल होंगे। 
मैं दावे के साथ कह सकता हुं कि अमेरिका यूरोप के लाइफ स्टाईल में रचे बसे भोजपुरी भाषी के सामने अचानक से नदिया के पार फिल्म देखने का संयोग आए, तब इन भोजपुरी भाषी के अंदर अचानक से कुछ चेंज हो जायेगा। सुक्ष्म मन हमेशा मातृभाषा को सुरक्षित रखता हैं, और चाहे आप किसी भी कंट्री के लाइफ स्टाइल में रचे बसे हो! मातृभाषा से सामना होने पर आंखे गिली होनी तय है। 
मां ही मातृभाषा है और मातृभाषा ही मां हैं। 
मातृभाषा दिवस की शुभकामना।

Saturday, February 18, 2023

The Brighter the light the deeper the shadow

Once Upon a Time. There Was The Brighter the light and the Deeper the shadow.
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रास्ते जानें पहचानें है लेकिन पैर थके मांदे हैं। सफर कुछ कदमों पर रुका सा है जैसे कही जाना नही चाहता हो। 
बिना चिड्डियो वाली आकाश हैं। थकी– उलझी शाम बेरंग सा वक्त के साथ घसीटे जा रही, जैसे रात में गुम हो दिन को भूलना  चाहती हो।  
शाम को लेकर मेरा निश्चित मत था कि शाम से ज्यादा दिलकश कुछ भी नही। दर्द और प्रेम से भीगी हुई... बिछड़ने का गाढ़ा रंग। 
 ढलते हुए सूरज भगवान का आहिस्ते आहिस्ते खोते जाना... चिड़ियों वाली आकाश, चिड्डियो का घर लौटना और थके मांदे उजालों का अंधेरों के आगोश में जाना।
वक्त वक्त की बात हैं और इसी वक्त में से निकल कर 
कुछ घंटे कोलाहल और निरवता के बीच चुपके से बैठ गए हैं।
 ट्रैफिक का शोर घर जाने को बेचैन हैं। चकाचौंध वाली सड़के आगे चल कर अतीत की परछाई लिए सुनी सड़को में तब्दील होते जा रही हैं।
इसी सड़क पर आगे चल कर वो जगह आती है। शहर को शहर से माइनस कर देने वाली जगह। लोग अपनी अपनी एकांत से मिलने यहीं पर आते हैं। 
रात में यह जगह आकाश को अपने अंदर समा लेता हैं। इतना बड़ा दिल की अंदर से चांद तारे झांक रहे होते हैं। 
उस हरे भरे जगह में टायर जलने की महक फैली हुई हैं।
 हजारों मील की यात्राओं में साथ चलने वाला टायर  आज जल रहा हैं। अच्छी बुरी यात्राओं में शामिल रहा वो टायर उन्हे याद कर रहा होगा जिनके इशारों पर चढ़ाई चढ़ता था, नीचे उतरता था। क्या चलाने वाले को याद होगा ?
 जलते जलते भी ठंड का सहारा बन रहा हैं। जलना किसी को भी अच्छा नहीं लगता, टायर को भी अच्छा नहीं लग रहा। बदबू का फैल जाना इसी का संकेत हैं।
सामने एक के बाद एक, दो पेड़ हैं, जो ठीक मेरे सीध में है। पेड़ को रोज आश्चर्य होता हैं कि कोई खाली बैठे करता क्या हैं? सोने के समय यहां बैठता कौन हैं।
 गांव की झुर्री वाली औरते जैसे बेवक्त किसी को देख हैरान होती है फिर अपनी किवाड़ बन्द कर लेती हैं, ठीक वैसे ही पेड़ भी नजरे मोड़ चिड्डियो को सुलाने में लग जाता हैं।
यह पेड़ हुबहू उस पेड़ जैसा ही हैं। पत्तो से हरा–भरा, जिससे एक यात्रा के दौरान मैं मिला था। सीना ताने अकेला खड़ा। दूर दूर तक उसके अलावा कोई दूसरा पेड़ नही था। 
बाद की वर्षो के मुलाकात में देखा की वह पेड़ निःशब्द बिना पत्तियों के ठंड में ठिठुरता खड़ा हैं। मालूम नही की पत्तियों के चले जाने से दुखी है या बिना पछतावा के खड़ा हैं। इस बार  कुछ बोला नहीं था।
जिंदगी के नियम बड़े उल्टे होते हैं। हम ऊपर जाना चाहते हैं नीचे गिरा दिए जाते हैं। नीचे रहना स्वीकारते है और एक दिन पाते हैं की सबसे ऊपर आ चुके हैं।
आगे वाला पीछे हो जाता हैं और पीछे वाला आगे।
जिंदगी को सीधे तर्क में कभी भरोसा नहीं रहा।
हम जिंदगी के राह पर ऐसे चलते है जैसे हाईवे पर चल रहे हो। सीधा चौड़ा रास्ता। 
लेकिन जिंदगी का कोई रास्ता सीधा नही होता।
जैसे पहाड़ियों के अंदर रास्ते होते हैं, जिंदगी के सब रास्ते वैसे ही गोल घुमावदार होते हैं।
वर्षो पहले की एक रात मैं पहाड़ वाली रास्तों पर  रोमांचित सा चल रहा था। सामने चांद दिख रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कुछ दूर और चलूं और फिर सीधा चांद पर पहुंच जाऊंगा। लेकिन दो घड़ी बाद वही रास्ता गोल घूम गया और चांद के तरफ मेरा पीठ हो गया।
जिंदगी के पास हर एक के लिए उसका खुद का रास्ता है। इस रास्ते पर कैसे चलना है, ये कोई और नहीं बता सकता। ना दोस्त , ना मां बाप परिवार पत्नी बच्चे। 
इस रोमांचकारी अनिश्चित रास्तों पर अकेला ही गुजरना होता हैं। हर एक कदम आगे का रास्ता कैसा होगा, यह तय करती हैं। 
बड़ी डरावनी यात्रा हैं यह। 
  सच्चे जीवन की राहों में असफलताएँ अधिक हैं।  संभावना है कि आप अपने आप को रोज खोते हुए अकेला पाएंगे और विशाल परिदृश्यों और गहरे जंगलों की खामोशी में चिल्लाएंगे! जहां आपकी आवाज वापस आपसे ही टकराएगी और कुछ समझ नहीं पाएंगे। 
 संभावना है कि आप के पास जो ज्ञान हैं, वह बेकार साबित होगा और आप खुद को मूर्ख की तरह नाचते हुए पा सकते हैं।
 सब जमा की हुई धारणाओं को ढहते पाएंगे जो दर्द देगा।  सबसे दर्दनाक बात, हर पल कुछ ना कुछ खोते पाएंगे।
एक सच्चे जीवन जीने की यात्रा लंबी है और हर दिन आप खुद को और अधिक झूठ और दर्द के साथ पाएंगे।
लेकिन मैं एक बात के लिए निश्चित कर सकता हूं की अनिश्चिताओ को स्वीकार करने के साथ ही रास्ते आसान हो जाते हैं। चाहें रो कर चाहें हंस कर चलना तो इसी रास्ते पर हैं जिसपर पांव दुखते हैं।

Monday, February 13, 2023

कृष्ण एक मुस्कुराता हुआ प्रेमी

कृष्ण एक मुस्कुराता हुआ प्रेमी।
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प्रेम शब्द ही जैसे मुझे कृष्णा की तरफ खींच ले जाता हैं। कृष्ण का जीवन जैसे परमात्मिक जीवन। अच्छे बुरे का कोई चुनाव नही। एक छोर– जहां अच्छे और बुरे दोनों आकर मिलते हैं। 
 ओशो पुरम में प्रेम पर अक्सर चर्चा होती थी और प्रेम सिमट कर कृष्ण के ऊपर आ जाता था।
जैसे कृष्ण को परिभाषित नहीं किया जा सकता वैसे ही प्रेम को परिभाषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि शब्दो से सत्य प्रकट नही हो सकता अपितु शब्दो से इसका आभास जरूर मिलता हैं। सबका एक मत था, चाहे वो अमेरिकन हो, यूरोपियन हो चाहे भारतीय। प्रेम परमात्मीक हैं। प्रेम का मतलब कृष्ण है। एक मुस्कुराता हुआ प्रेमी जिन्होंने प्रेम को जिया और अमर कर दिया। 
प्रेम मुक्त करता है। स्वतंत्रता लाता हैं। मुस्कुराहटे बड़ी करता हैं। ऐसे प्रेम को जीसस ने ईश्वर कहा हैं। बुद्ध ने ध्यान की अंतिम परिणीति कहा हैं। महावीर ने केवल्य का स्वभाव कहा।
 तभी तो कृष्ण ताउम्र मुस्कुराते रहे इसके वावजूद की वो गुकुल से दूर रहें। 
एक बार जो  प्रेम की गलियां छूटी फिर पलट कर देखा तक नहीं।
 शायद प्रेम नदी जितना पवित्र होता हैं। शायद प्रेम में नदी की तरह वापस मुड़ा नही जा सकता।  यादों को गहराई में समेटे बढ़ जाना ही  इसका स्वभाव हैं। 
राधा रोई कृष्ण मुस्कुराते रहे। प्रेम में तृप्त हुआ मनुष्य आगे बढ़ जाता हैं। 
प्रेम करना या होना बिना कारण होता हैं। अगर प्रेम में कारण खोज लिया जाए तो ये प्रेम नही होकर मोह बन जाता हैं। 
राधा रोई क्योंकि कृष्णा का फिक्र आंसु लाया था। मोह रुलाता हैं। पाने का अधिकार मोह उत्पन्न करता हैं। 
प्रेम तो खुद में मुक्त होता हैं। ना किसी पर कब्जा करता हैं और ना किसी को कब्जा करने देता हैं। 
ओशो का कहना था की प्रेम सुखी लकड़ी जैसा हैं। सुखी लकड़ी के जलने पर कोई धुआं नही उठता। अगर धुआं उठ रहा तो धुआं विजातीय हैं। लकड़ी अभी कच्ची हैं। गीली है। 
प्रेम से अगर आंखे अंधी हो रही हैं, धुआं पैदा हो रहा, जिंदगी पर कालिख लग रही हैं। क्रोध उत्पन्न हो रहा। ईर्ष्या जलन पैदा हो रही तो प्रेम में अभी बहुत कचरा हैं। निर्मोह करो प्रेम को, मोह धुआं पैदा करता है।
लाओत्से ने अपनी किताब में परमात्मा को बिना शब्दो के बांधे रखा है। मतलब अबूझ। जैसे प्रेम अबूझ होता हैं। 
 बारिश के दिनों में कच्ची दीवाल पर बन जाने वाली आकृति। जिसकी जैसी समझ वैसी कल्पना कर लेता हैं।
कृष्ण प्रकृति हैं। मतलब प्रेम प्रकृति है। इतना कठोर की कोई दया नही उनके पास आपके आंसुओ के लिए। कोई शब्द नही सांत्वना के। कोमल इतना की एक आह से तड़प उठे।

Sunday, February 5, 2023

नीला पहाड़

नीला पहाड़
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नदी का पानी हर चीज को अलविदा करते आगे बढ़ता  जाता हैं। गांव, घर, चेहरे, हरेभरे मैदान, सूखे पेड़, उजाड़ रेगिस्तान, पहाड़, और किसी की प्यासी आंखे! सभी को अंतिम विदा करते बस बढ़ता ही जाता है। 
यह जानते हुए भी कि आगे बढ़ना लगातार कुछ खोते जाना हैं। अकेले होते जाना है। मैं भी बस चल पड़ा हूं। 
किसी दिन जब अंधेरा भारी होता हैं और चांद दिखता नहीं तो हम अनमने हो अनिश्चय में धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं। उस रात भी वैसा ही अंधेरा पसरा था। हर कदम के बाद अंधेरा और घना होता जा रहा था। 
अंधेरों में जब मौन पसरा हो तो वह अंधेरा डरावनी और रहस्यमई लगने लगती है।
कोई ओर ना छोर! कहां जा रहे पता नहीं। कहां जाना है निश्चित नहीं।  
वो रात भी ऐसी ही थी- अंधेरा किसी अजगर कि भांति मुझे निगल जाना चाहता था। अंधेरों में खोता जा रहा था- शून्य सा! 
लड़खड़ाते कदम रुकता जा रहा था और सामने दिख रहा नीले पहाड़ कि भांति बस जम जाना चाहता था। 
मै भी उस नीले पहाड़ कि तरह ही कभी था। अनसुलझा, बेपरवाह, पूरब से चलने वाली हवाओं के साथ उड़ने वाला। सुंदर! मुस्कुराता हुआ हरा भरा। सूरज की रौशनी से लाल - उजला - काला- सुनहरा- गुलाबी होता रहता था। शाम ढलते ही कई रंगों को एक साथ
 ओढ़ रंगीन हो जाता था। रात की रानी अंधेरों में चुपके से आकर मुझे थपकी दे एक प्यारी नींद सुला जाती थी। 
सामने दिख रहा नीला पहाड़ अब बदल चुका हैं - जो ठंडी आधी रात को कोहरे से भस्म हो चला हैं। वक़्त की धुंध में अपने कई हिस्सों को खो चुका हैं। और कुछ अभी भी धीरे-धीरे खोता जा रहा, अपने आप से दूर होता जा रहा है। तूफानी धूल उड़ाती हवा के साथ उसका भी कुछ हिस्सा रोज टूट रहा हैं। वे  हिस्से जो टूटते जा रहे हैं... शायद वे अनुपयुक्त थे। वे शायद बाकी बचे  सह अस्तित्व के लिए अनुकूल नहीं थे। 
मै भी चलते-चलते कुछ ना कुछ खोता जा रहा हूं। ये हवाएं और तूफान मेरे गौरवशाली ढांचे से टकराता है। अप्राकृतिक ढांचे को उड़ा लेे जाता हैं। मुझे भी कुछ दूर तक धक्के दे साथ में उड़ा ले जाता हैं। और फिर मुझे केवल मेरे सच्चे अवषेशों के साथ छोड़ जाता हैं। मेरी आंखे बंद हो जाती हैं और उस समय को याद करती हैं जब मैंने अपने से खुद को बहुत बड़ा महसूस किया था। 
पास ही कहीं खाई में जम चुकी काई के ऊपर गिरते पानी का शोर मेरी आंखो को खोलता हैं और मै उस खाई में गिरने से बच जाता हूं। 
और उतर कि तरफ मुड़ते हुए पहाड़ियों के रहस्यों के साथ आगे बढ़ जाता हूं।
आंखे रहस्यों से तब भी बंद हो ही जाती है।

© अविनाश पांडेय

Saturday, February 4, 2023

अबकी बार यह पूरब से चलेगा

अबकी बार यह पूरब से चलेगा।
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अच्छा या बुरा नही होकर एक वक्त हैं। जो वक्त बेवक्त खाली हो जाता हैं। उस खालीपन के अंदर कई मौसम एक साथ रहा करते हैं। 
आज चमकती हुई धूप हैं। सर्द मौसम बहुत पास से गुजर रहा है। धूप निश्चिंत हैं कि अब सर्द मौसम बाधा नहीं बनेंगे, लेकिन बीच बीच में  बेमकसद भटकती असंतुष्ट बदली धूप को आशंकित करती हैं। इस आशंका को तब और बल मिलता हैं, जब हवाएं अट्टहास करती पास से गुजर जाती हैं। 
शोर करता यह उद्वेलित मालूम पड़ता हैं जैसे बेमतलब का हो। 
बेमतलब का होना इसे और जंगली बनाता हैं। उपेक्षा और तिरस्कार से सख्त हो चुका, यह लोगो को दर्द दे कर अपना गुस्सा निकालता है। अपनी पहचान खातिर बार–बार शोर करता अपनी मौजूदगी का अहसास कराता हैं। 

लेकिन इन जाड़ों के बाद वाली धूप में तुम्हारा क्या काम? 

  वेग से गुजरती इन हवाओं को देख धूप थोड़ी देर के लिए ठिठक पड़ती हैं। जानी पहचानी लेकिन पहचान का कोई सिरा नजर नहीं आता। मिलने की खुशबू आ रही , लेकिन कैसे मिले थे याद नही!  हवाएं शिकायती और उम्मीद की मिलीजुली नजरों से धूप को ताक रही हैं। जैसे कुछ इशारा करना चाह रही हो। "भूल गए क्या वो तपिश जब मुझे गले लगाएं थे? भूल गए वो शाम जब मेरे आगोश में ताजे हुए थे। या सुकून वाली वो रातें जब तुम मेरे सपनो में सोएं थे? अब मुझे तुम्हारी जरूरत हैं और तुम मुझे निचोड़ रहे हो। सूखा डाल रहे हो।  कोई कैसे भूल सकता हैं!" 
धूप निःशब्द हैं। थोड़ी देर के लिए सहम जाता हैं। यादें पीछा करती हैं और सुबह ओस बन जाती हैं।  
  बेउम्मीद मुसाफ़िर बन चुका हवा शुष्क हो चला हैं। धूप का सहारा मिले तो अभी भी बरस सकता हैं, लेकिन इसके आसार नजर नहीं आते। धूप को भी फरवरी का कर्तव्य निभाना हैं। ऐसे कैसे उस आवारगी में वापस मुड़ जाए। 
एक दर्द फैल रही हैं हवा के अंदर, एक ऐसा दर्द जिसे दस्तक की कमी खाती हैं। जिधर से गुजरती हैं खामोशी पसरा देती हैं। यह सिर्फ खामोशी नही जादुई खामोशी हैं– जो सर्द हैं रूखा सूखा हैं। सामने पड़ने वाले खुद ब खुद इसमें समा जाते हैं।  
यह संक्रमण काल हैं, जिधर ठंडी गर्मी आमने –सामने, नजरे मिलाए एक दूसरे से विदा ले रहे हैं।  और अंततः किसी एक को विदा हो जाना हैं। बेदिली से ही सही हर बार इस मौसम में सर्द हवा को ही विदा लेनी पड़ती है। कुछ वक्त गुजार चुकने के बाद भला कौन कही जाना चाहता हैं। 
लेकिन कोई आगे बढ़ने के वावजूद भी एकाएक चला तो नही जाता? 
 ये सर्द हवा भी एकबारगी नही चला जाएगा। जाने कितने प्रेमी जोड़ों को एक दूसरे से वादा करते देख मुस्कुराएगा। ईश्वर से इनके लिए रहम की भीख मांगेगा।   फरवरी को मार्च बनाएगा। सुर्ख रंगो में  रंगते चला जाएगा। ऐसा जाएगा की पेड़ के सारे पत्ते दूर तक उसका पीछा करेंगे। 
सड़क छत खेत तालाब से गुजर कर यह उन गलियों से भी गुजरेगा जिन गलियों में शोर हुआ करता था। अब रात की वीरानगी है। 
अतीत को ओढ़े उस जर्जर महल के सूखे रंगो को कुरेदता उसके सीलन को अपने साथ लेता जाएगा।
खंडहर हो चुके उस मकान के गलियारों से भी गुजरेगा और बंद किवाड़ वाली उस कमरे में सपनों को मुस्कुराता छोड़ आगे बढ़ जाएगा। 
चलते चलते यह नदी बन जाएगा। समतल पे सरपट दौड़ेगा, खाइयों को भरते थमी थमी चलेगा। सामने पहाड़ आए, किनारे हो लेगा। जंगल को सींचते यात्रा चलता रहेगा। 
क्या हैं यह जिंदगी? कभी सब दे देती हैं। कभी एक झटके में सब छीन लेती हैं! लेकिन इस लेन देन में जिंदा रहना जरूरी हैं। इस बात का हवा को पता हैं। रौशनी चौराहे मुहल्ले खेत खलिहान ओझल होने लगे हैं।
 यहां से अकेलेपन की यात्रा हैं। वापसी की यात्रा की नियति हमेशा से अकेलेपन की रही हैं। अकेलापन अकेला ही रहता हैं। जिस पल किसी के साथ की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वह पल प्रायः अकेला गुजरता हैं। कुछ सच्चाईयां भयानक होती हैं। उनके नुकीले दांत होते हैं। 
उस जगह से बेदखल हो जाते हैं जहां कुछ वक्त गुजार चुके होते हैं। मन रम जाता हैं। अहंकार अपना घर बना लेता हैं, एक सुंदर महल। 
और जब यहां से रवानगी होती है तो सब कुछ बदल जाता हैं।
 दिलकश अंदाज की जगह भावशून्यता दिखती हैं। स्वागत करती बांहे अब मजबूरियों में कांप रही होती हैं। 
शब्दों में इतनी भी हिम्मत नही कि ढंग से विदा  कर सके।  
सामने कई रास्ते हैं। जो आगे चल कर एक हो जाते हैं। 
वह रास्ता रेगिस्तान को जाता हैं। रेगिस्तान सुना ही था सुना ही रहा। 
लोग रास्ते बनाते गए और आंधियां निशान मिटाते गई।
 ऐसी पल भर में खो जानें वाली रास्तों में वह होकर भी नही था। 
  किनारे खड़ा वो पेड़ नजदीक आ रहा  हैं।
 उमंगों की यात्रा में इसी जगह कुछ वक्त के लिए ठहरा था। 
पत्तियां नई–नई सी थी। चिड्डियो की आवाज़ें जैसे महबूब की पुकार हो चले थे। 
 ढोल बाजे दूर कही गांव में बज रहे थे। शायद कोई दुल्हन धड़कते दिल से अपनी बारात का इंतजार कर रही थी। 
अब वो गांव दुल्हन को विदा कर अलसाया सा पड़ा था।
 पेड़ भी मौन था।
 मुझे पहचानता था मालूम नही। बिना पहचान के कौन कही रुकता हैं।
 सामने सपाट आकाश दिख रहा है। मिलों फैली तन्हाईया बांहे फैलाए खड़ी हैं। स्वागत कोई भी करे अच्छा लगता हैं। 
शून्य हो चला है समय। समय का शून्य हो जाना वक्त को थाम लेता हैं।
 सुख चुकी हवा को लहरे भींगो देने खातिर पास बुला रही हैं। 
कभी लहरों के ऊपर हवा तो कभी हवा के ऊपर लहरें। जैसे ईश्वर सबको अपने आगोश में ले लेते हैं वैसे सागर भी हवा को अपने आगोश में लेकर भिगो रही हैं।
 हवा को नया बना रही हैं।
हवा का नया जन्म हो रहा हैं। 
अबकी बार यह पूरब से चलेगा।

Friday, February 3, 2023

एक दिन, वे दिन चले गए।

एक दिन, वे दिन चले गए।
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एक शाम हैं लेकिन शाम जैसी लग नही रही। 
दिन से बेदखल शाम रात के हिस्से आ जाती हैं। 
रातें ज्यादा काली होती हैं। मुर्दा सपने चमगादड़ों की भांति उल्टा लटके मिलते हैं। 
रात की साए में लिपटी सुबह, दबी–सहमी सी होती हैं।
 रहस्यों से ओतप्रोत, खुली खिड़की से आता उजाला डरावनी मालूम पड़ता है। 
 धूप और छाया मिलकर रहस्यों को बुन रहे हैं। शायद अब यह मौसम बदलने वाला हैं। 
एक चुप हैं जो चुप चाप आकर कमरे में बैठ गया हैं।
 उजाले अंधेरों से बात करना चाहते हैं पर उजालों में अंधेरों से बात नही होती। 
एक घड़ी है जो टिकटिक करती गोल घूम रही हैं और उसकी शक्ल बदलती जा रही हैं। यादों की पतली रेखा शक्ल को पहचान से जोड़ रखी हैं। यादों से बाहर हो जाने की छटपटाहट में ये पतली रेखा और कसती जा रही है। गले तक कस आई यह छटपटाहट अब घड़घराहट में बदल चुकी हैं। 
अनायास था सब। हसरतों की पगडंडी पर चढ़ना रुकना फिसलना, फिसल कर वापस मुड़ना...
फासले बड़े होने लगे थे। 
हजारों ऐसे फासले, जो बड़े होने लगे थे वे चल पड़े थे। हम पीछे रह गए थे। चलना चाहे भी तो पकड़ नही पाए थे। आंखो में सूनापन छोड़ ये फासले अब ओझल होने लगे थे। 
हालाकि रास्तों ने हर किसी का रास्ता बन जाने का खूब पाश्चताप किया था। 
सफर, रुकता–चलता,  डूबता–उलझता, उदास पैर। 
कौन देश कौन मुसाफिर?
एक दिन, वे दिन चले गए।

Wednesday, February 1, 2023

पता नही किस मोड़ से गुज़र कर इस मोड़ पर चलें आए।

पता नही किस मोड़ से गुज़र कर इस मोड़ पर चलें आए। 

शब्दों की है यह दुनियां। शब्दों से बने हम और आप।
शब्द हैं पहचान— गहरी या उथली। उजली या काली। खोखली?
शब्द – जैसे हम बोलना सीखते हैं वैसे ही एक– एक शब्दों को मार,  खामोश होना सीखते हैं। सबसे पहले जाती हैं हंसी की आवाज, खिलखिलाना, किसी को पुकारना... पसरती सन्नाटा और अंततः  खामोश हो जाते हैं। 
एक हंसता खेलता रोता शब्द एक दिन अचानक से खामोश हो जाता हैं। खो जाती हैं सारी आवाज़ें। आवाजें जो बंद खिड़की को खोलती थी, हसरतों की लाल किरण को अंदर लाती थी। सपने बुनती थी। शिकायते करती हुई गुस्से से लाल हो पश्चिम में धीरे धीरे डूब जाया करती थी।
शब्द जब अचानक से खो जाते हैं तो ऐसे में किसे पता हैं – वो रौशनी में घुली आवाज़ें किन बंद दरवाजों को खोलती थी। किसे पता हैं, आवाज़ें बन किस  हंसी को बाहर खींच लाती थी।  
मगर ये शब्द अचानक से नही मरते– खामोश नही होते। खामोश होने से पहले शोर करते है। दिमाग को फाड़ देने वाला शोर। यह शोर भी एक प्रश्न होता हैं कि क्या बोले या बोलने का क्या सार! 
और जब ये शब्द खामोश हो जाते हैं। नज़र आता हैं रेगिस्तान – विरान खालीपन। पहाड़ी धुंध।  
और उस पार क्या दिखता हैं! 
 स्वयं के अंदर आती–जाती सांसे? 
शब्दों के पार बड़ी क्रूर दुनियां होती हैं।
बड़ी सुक्ष्म, निर्मम। शब्द दाग देता हैं सैकड़ों बाण। अपने ही मन को सैकड़ों टुकड़ों में बांट, घायल हो नीले आसमान को निहारता जाता हैं। आसमान में आवारगी करता जिद्दी बादल के साथ हो लेता हैं। इधर उधर मंडराता,  हवाओं के तेज झोंके में उलझ बरसते हुए मन को आखिरी विदाई दे रहा होता हैं।   
 शब्दों की मौत – स्वयं की समाप्ति। उन सभी चीजों की समाप्ति जो इन शब्दों के ऊपर बने थे।