Tuesday, October 29, 2019

Absence of Trust Fear Rules. लव का खेल।

Absence of trust fear rules.

दो डरे हुये लोग अपने –अपने अकेलेपन- बोरियत से परेशान है । साथ हो लेते है । एक खेल खेलते है जिसे वे लव कहते है। तो क्या हुआ जब आपको अपने अकेलापन के लिए अपने बोरियत को दूर करने के लिए कोई और अच्छा साधन मिल जाए ? या फिर संबंधो मे ऐसे लगे जैसे-जो सोचा था वैसा तो कुछ नहीं। क्योकि डरे हुये लोग, अपनी इच्छावों को पूरा करने के लिए संबंध बनाने वाले लोग, अपनी महत्वाकांछा को पूरा करने के लिए संबंध बनाने वाले लोग  और अकेलापन को दूर करने के लिए संबंध बनाने वाले लोग, क्या वाकई एक दूसरे को खुशिया दे सकते है? 
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कुछ ही दिनों मे दोनों एकदूसरे से ठगा महसूस करने लगते है आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो जाता है । दिलचस्प बात तो तब देखने को मिलता है जब यह महसूस करने के वावजूद की दोनों को एक-दूसरे का 
साथ पसंद नहीं, यह साथ सिवाए दुख के और कुछ नहीं देता फिर भी दोनों का अहंकार (ego) उलझाए रखने के लिए नए-नए तरीके खोजता है। एकदूसरे को गुलाम बनाने का खेल शुरू होता है और अनजाने मे ही जिसका साथ हमे लो-फील कराता है उसे ही हम अपनी दिनचर्या का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना बैठते है ... हर पल ये अहंकार बदले की सोचता है, बजाए ये सोचने के की हम दोनों की खुशी किसमे है। कैसे उसे दुबारा गुलाम बनाए। बिना यह सोचे की गुलाम बनाने वाले अक्सर गुलाम बन जाते है,इसके लिए अनगिनत विचारो का सिलसिला और फिर बचकाना हरकते शुरू हो जाता है।    
नशे की हालत मे किए गए फैसले वक़्त आने पर अक्सर बदल लिए जाते है । 
           जब सब-कुछ सामान्य हो जाता है। सामान्य से मेरा मतलब काफी कुछ खो देने के बाद तो यह अहसास होता है की क्या मैंने जो कीमत चुकाई,वो मूल्य सही था? पर अफसोस! हर बार हमे अहसास यही होता है की वो कीमत बहुत ज्यादा थी जो हमने चुकाई।  
हर बार पास्ट मे जो हमने अपने अहंकार की अपनी इच्छाओ की अपने लालच की और अपनी अंधी दौड़ की  जो कीमत चुकाई है वो ज्यादा थी। आने वाले समय मे हर बार एक ही नतीजे पर हम पहुँचते है। हम पाते है की वो कीमत बहुत ज्यादा थी जो हमने चुकाई थी । 

   

Monday, October 28, 2019

The Brave win the Beauty. The Beauty win the Brave.

The brave wins the beauty. The beauty wins the brave.  :)

यह तो हमारा मानसिक पैटर्न है जो दुखो को फौरन अपने से रिलेट कर लेता है। दुख जो हमे ज्यादा सहज और सुविधाजनक मालूम पड़ते है, यही हमारी जीने का ढंग है,जिसे हम लोग जाने-अनजाने पोषित कर चुके है और करते चले जाते है।  
हम दुखो को, किसी भी प्रकार की नाकारात्मक्ता को पोषित कैसे करते है – बीते हुये समय की बुरी यादे, किसी ने धोखा दिया, किसी ने विश्वास को चोट किया, हमारी बार-बार की असफलता, हमारी परवरिश- माहौल से मिलने वाली निराशा इत्यादि सब मिल कर विचारो की एक जाल पैदा करते है और जीवन के लिए एक धारणा बनाते है। एक ऐसी धारणा जो निराशावादी-नकारात्मक एवं जो आने वाले कल के लिए एक डर पैदा करते है। 
कहते है अंधेरा, अंधेरों को आकर्षित करता है। फलस्वरूप हमारी धारनाए(auto-suggestions) जो डर-निराशा-बुरी-यादे,दुख,दर्द के आधार पर बनी हुयी है वह हमारी आने वाली कल और आज को भी अपने जाल मे जकड़ लेती है।     
 एक औसत मनुष्य का दिमाग अपनी रोज की जिंदगी मे, 24 घंटा मे लगभग 60000, विचार (thought) पैदा करता है। 60,000 विचारो मे लगभग 95%- 57,000 विचार हमारे भूतकाल – बीते हुये कल की बुरी यादे । भविष्यकाल यानि आने वाले कल से संबन्धित डर (fear) के होते है। सिर्फ 3,000 विचार हमारे आज के लिए होते है और यह 3000 विचार भी दबे-कुचले से छुपे हुये होते है । अब भला 57000 नकारात्मक शत्रुवों के सामने 3000 सकारात्मक विचार कब तक सकारात्मक रह सकते है। फलस्वरूप वह भी इन 3000 सकारात्मक विचारो को अपने रंग मे रंगना शुरू कर देते है। नतीजा यह होता है की हम जैसे है चाहे कितना भी बुरा उसे स्वीकार करते जाते है, जीते चले जाते है, यह लगभग वैसा ही होता है, जैसा वो मेढक जो हर बार पानी के बढ़ते तापमान पर अपने को एडजस्ट करते जाता है और जब पानी ज्यादा गरम हो जाता है तो फिर उसके पास इतनी भी एनर्जि नहीं बचती जिससे वो अपने-आप को बचा सके। हमारी भी इस समय की मनोस्थिति- भ्रांति (illusions) ऐसा ही होती है। हरेक बढ़ते दुखो को हम एडजस्ट करते जाते है और अंत मे अपने ही  नाकारात्मक्ता के कारण हम मारे जाते है।  शायद हम इससे बेहतर हो सकते थे पर यह हमारी ही बनाई नाकारात्मक्ता का जाल थी जो हमे बदतर के लिए भी एडजस्ट कराते चली गयी। कही कोई सकारात्मक योजनाए भविष्य के लिए नहीं बना पाये क्योकि हम इससे निकल कर कुछ सोच भी नहीं पाये। सोचते भी कैसे .......................................................................................................................
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           मेरी आने वाली किताब मे से कुछ अंश

उसकी चुप में

एक चलता- फिरता हसता-बोलता आदमी 
कभी नहीं सोचता की उसके जीवन में एक दिन 
ऐसा आएगा 
जब उसकी हंसी पर  ताला लग जायेगा 

वह मुसीबतों से नहीं डरता 
लड़ने से नहीं घबराता 
यहाँ तक की कई बार 
मौत को घर से बाहर धकेल चूका होता है 

ऐसा आदमी जब किसी दिन अचानक चुप हो जाता है
तो एक बहुत जरुरी आवाज़ 
हवा में घुलने से रह जाती है 
फिर इसके बाद 
कहां क्या - क्या होने से रह जायेगा 
यह कौन किसको बता पाएगा 

यह तो वह खुद भी नहीं जानता
की हवा में घुली हुयी उसकी हंसी 
किन् बंद दरवाज़ों को खोलती थी 

मैं नहीं जानता 
ऐसी हालत में क्या किया चाहिए 
सिवा इसके की  थोड़ी देर के लिए 
उसकी चुप में शामिल हो जाना चाहिए.

धोखा

'जलने की शिकायत क्यो ... निखर भी तो गये`. 
  धोखा देना, धोखा खाना, दोनो ही जानलेवा हैं. 
दिन को रात बना देता, रात को दिन बना देता. 
अपने आप से विश्वास खतम हो जाता हैं. 
सारी मान्यताये तहस-नहस , बिखर जाती हैं.
 आदमी वो नहीं रह जाता हैं, जो पहले था. सारी दुनिया से नफरत सी हो जाती हैं. मामला अगर दिल का हो तब तो सारा अस्तित्वा ही हिल जाता हैं. 
और सबसे मुश्किल तो तब होता हैं जब धोखा देने वाले, मतलबी, इलजाम भी आप पर ही डाल दे बेशर्मी से.

किसी को धोखा देने से पहले थोड़ा सोच ले, की कही अंजाने मे आप बहुत बडा गुनाह तो करने नहीं जा रहे. 
(सिकरेट बात - धोखा के बाद मजा आ जाता हैं, जो संभलना जानते हैं . ) :) :) ;) ;)

Everything happns for a reason... If someone leaves u alone.. thn dont worry... Some1 else is thr who is praying... Just to b with uh.. #Desrving one will come to uh .. :* Nevr cry for any one... :)

Dear self

Dear Self 
Please पिछे जाना बंद करो उनके लिये जो बार-बार तुम्हे चोट दे रहे हैं . और वे लोग जो तुम्हारे emotions को hurt करते हैं, वे कभी भी तुम्हारे heart को heal नहीं कर सकते .
                      तुम किसी कारण से ही दुर हुये हो .
yes वो तुम्हारा पीछा करेंगे लेकिन पिछे मुड के देखना नहीं तुम्हे , क्योकी वे repeat करेंगे वही चिजे पुराना, जो तुम्हे insult, fadeup करता हैं और stuck बनाता हैं .
       तुम deserve करते हो respect के लिये. 
कोई नहीं perfect हैं यहा, हा तुम अपने लिये ज़रूर हो.
finally यही समय हैं आगे बढना सिखने का, और आगे बढ़ जाने का, वैसे लोगो और चिजो से - जो  तुम्हे खुश नहीं रख सकते, तुम प्यारे हो, यह अहसास नहीं दिला सकते, उनके लिये महत्वापूर्ण हो इसका विश्वास नहीं दिला सकते.
Trust me ... I know you more than anyone else. You deserve to love .

जब सॉल्यूशन पास नहीं हो तो प्रॉब्लम से बचना चाहिए।

हाइहील पहनी हुई कोई लड़की यह नहीं बोल सकती की हाईहील पहन कर चलना आसान है। कई बार गिरना भी पड़ता है मगर लंबी दिखने की चाह और फ़ैशन बुरा फील नहीं होने देता। मैंने भी अपने लिए यही सिद्धान्त अपनाया था। हो सकता है कुछ डिफ़्रेंट चिजे करने से दिक्कत महसूस होती हो मगर यह फीलिंग भी कमाल की होती है, “यू आर डिफ़्रेंट फ्रम क्राउड़”।                                                                 
मेरी जिंदगी मुझे कभी यह विश्वास नहीं दिला सकी की कल मै तुम्हारे अनुसार ही चलूँगी या मैंने भी जिंदगी से कभी यह वादा नहीं किया की जो आज कर रहा हूँ वही कल करूंगा। क्या पता तुम कही नए रास्ते तलाश कर लो और मै उन पुराने रास्तो पर ही खड़ा रह जाऊ! मै सही या जिंदगी सही! कोई नहीं जानता की अच्छा क्या है और बुरा क्या है? कौन कर सकता है निश्चित? कल जब हम बच्चे थे तो हीरो को ही पसंद करते थे मगर समझ पैदा होते ही हम विलेन को भी समझना चाहते है।                                                        मैंने भी अपने को तभी समझा जब टुकड़ो-टुकड़ो मे बट चुका था। कभी इधर कभी उधर होता रहा था। अहंकार सर चढ़ कर बोलता था। किए हुये मूर्खतापूर्ण कामो से भीड़ मे मिलकर भीड़ का  समर्थन पाना चाहता था। बेलगाम इच्छाये मुझे बंदर की तरह नचाती थी। कभी उसी इच्छायों की आग मे जलते हुये अपने को आँसुओ की दलदल मे धंसा पता था और यही वो समय था जब मै अपने टुकड़ो को वापस से जोड़ते हुये जाना था की ‘अंधेरे से अंधेरा दूर नहीं किया जा सकता’। इसी समय यह अहसास हुआ था की हमारे जीवन की जटिलता एक बुनियादी बात से निर्मित होती है और वह बुनियादी बात यह है की- हम जो नहीं है वही दिखाने की कोशिस मे लग जाते है। खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए ऐसे-ऐसे कार्य कर लेते है जो भविष्य मे मूर्खतापूर्ण साबित होते है।                                    
मैंने जिंदगी के उस फैलाव को भी देखा था जहा से मृत्यु सामने खड़ी हुई मेरे विल पावर की परीक्षा ले रही थी और उस परीक्षा मे फ़ेल होने का मतलब था ‘मृत्यु’! मानसिक स्तर पर भी मैंने अपने को चरम स्तर पर देखा! जहा पर मेरे अंदर रोग के लिए एक छोटी सी स्वीकार और डर मुझे मानसिक रोगी बना सकता था। काफी करीब तक पहुंचा भी था मगर मेरी नहीं डरने का सौगंध मेरे और मानसिक विकृतियो के बीच दीवार बन गई थी। उन दिनो मेरा यह विश्वास की “भाग्य भी साहसी का साथ देता है” और “हम लोग शायद इसलिए अटक जाते है क्योकि जिस दरवाजे को खींचना होता है उसे हम धकेल रहे होते है” ने मेरे लिए निर्णय लेने मे काफी सहायता किया था। इस विश्वास के कारण ही मै उस शक्तिशाली समय से भी आंखो मे आँख डाल कर मिलाया था जब मै भीतर से काफी दुर्बल हो चुका था। उस समय हर छोटी सी चीज़ या किसी द्वारा कहा गया छोटा शब्द भी काफी प्रभाव डाल देता था। मन तिलमिला जाता था मगर नित्से ने सही कहा था की जो चिजे आपको मारती नहीं वही चिजे आपको मजबूत बनाती है। मैं भी  कमजोर पलो मे मुझे दुखी करने वाले क्रियाओ को बिना प्रतिकृया के सह लेता था।  मैंने सुन रखा था की बुरे समय मे तुरंत-तुरंत प्रतिकृया से बचनी चाहिए और कम बोलते हुये ‘जब सोल्यूशंस पास नहीं हो तब प्रोब्लेम से बचना चाहिए’। मैने भी वही किया था।.....
                                              
                                    ..... मेरी आने वाली बूक से

या तो आप हीरो की तरह एक बार मरते है या फिर विलेन की तरह रोज रोज।

कदम कदम पर जहां मौत इंतजार करे,
बड़ा मजा है अगर जिंदगी की बात करें।
       विलेन हमेशा से ही हीरो से ताकतवर होते रहे है.लेकिन हीरो में कुछ बात ही ऐसी होती    है जिससे वो हमेशा ही जीतते जाता है.
कई बार मैं इस प्रश्न पर विचार करता हूं कि नायक कौन होता है? वह कैसे बनता है? और हर बार मैं एक ही निष्कर्ष पर पहुंचता हूं। बात-बात पर झलकती आपकी बहादुरी नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में किया गया आपका व्यवहार आपको नायक बनाता है। जब आपके हाथ-पांव फूल जाएं, जब झटका इतना ज्यादा हो कि वह आपके विवेक, संयम, धैर्य और ऐसी ही अन्य चारित्रिक विशेषताओं को जड़ कर दे,  तब आप वापस सामान्य होने के लिए कितनी सफल लड़ाई लड़ पाते हैं, यही है नायक होना, हीरो होना।
            हमारा मन दुख के प्रति अधिक संवेदनशील होता है। तभी जीवन में खुशियां होते हुए भी दुख ही दिखाई देते हैं। चेहरे पर रहने वाली मुस्कान कहीं गुम हो जाती है।
शोधकर्ता सोन्या लिबोमर्सकी के अनुसार, व्यक्ति की खुश रहने की क्षमता का 40% हिस्सा अविकसित रहता है। यानी हम अपनी खुशियों को 40% तक बढ़ा सकते हैं। शेष 60% खुशियों में 10% परिस्थितियों से जुड़ी होती हैं और 50% खुशियां स्थिर रहती हैं।
एक ना को चाहिए तीन हां...
 बारबरा फ्रेडरिक्संस सकारात्मकता पर किए अपने शोध में यही कहती हैं। नकारात्मक (विलेन)  विचारों की इस ताकत को वह 3:1 के अनुपात से प्रस्तुत करती हैं। वह कहती हैं कि एक नकारात्मक विचार के असर को कम करने के लिए तीन सकारात्मक विचारों(हीरो) का होना जरूरी होता है।
 मैंने देखा है कि लोग जैसे ही अपने कर्मों और जीवन की जिम्मेदारी खुद लेना शुरू करते हैं, वे बहुत ऊर्जावान हो जाते हैं,  उनमें प्रेरणात्मक नजरिया बढ़ जाता है और संकल्प की दृढ़ता भी बढ़ती है। इसीलिए हीरो की तरह
गुलाम मानसिकता को किनारे कर-दुसरो में हीरो तलाशने से बेहतर हम खुद मौलिकता के साथ अपने आप का हीरो बन सकते है.अपने अंदर हीरो के गुण विकसित करे जैसे कमजोरो का साथ देना,बुजुर्गो के प्रति सम्मान,अन्याय का विरोध,मानवता को प्रधानता देना इत्यादि और जैसे ही ये गुण विकसित होते जायेगा, आप एक हीरो की तरह पहचान छोड़ते जायेंगे.
लेकिन विलेन हीरो से मजबूत होने के वावजूद हारता क्यों चला जाता है? ये ऐसे ही जैसे #व्हाई थिस कोलाबेरी सांग समझ में नहीं आने के वावजूद भी इमोशन को जगा देता है  :)
              दोस्तो,  आज बहुत से लोगों की जिंदगी टैंक में पड़ी मछलियों (विलेन)  की तरह हो गयी है,  जिन्हें जगाने के लिए कोई शार्क मौजूद नहीं है। अगर दुर्भाग्य से आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है,  तो आपको भी जीवन में नयी चुनौतियां स्वीकार करनी होंगी। आप जिस रुटीन के आदी हो चुके हैं,  आपको उससे कुछ अलग करना होगा। आपको अपना दायरा बढ़ाना होगा,  जिंदगी में रोमांच लाना होगा। नहीं तो बासी मछलियों (विलेन)  की तरह आपका मोल भी कम हो जाएगा। लोग आपसे मिलने-जुलने की बजाय नजर बचाते दिखेंगे।

Sunday, October 27, 2019

Life Settings Goal.


Know Your Depression


Belief Design


The stage of Behaviour Change


Meditation Not medication

ध्यान : Meditation.

जीवन के उद्देश्य को प्राप्त करने और तनावमुक्त रहने का सबसे सरल एंव उपयोगी तरीका ध्यान या Meditation ही है| जानिए क्यों और कैसे केवल 20 मिनट का ध्यान या Meditation हमारी जिंदगी बदल सकता है|

Meditation : Hear You Inner Voice

Meditation या ध्यान, स्वंय से बात करने की विधि है|

 हर मनुष्य के अन्दर एक शांत मनुष्य रहता है जिसे हम अंतरात्मा कहते है| हमारी अंतरात्मा हमेशा सही होती है और इसीलिए शायद यह कहा जाता है कि हम ईश्वर का अंश है| सभी महान लोगों ने यह स्वीकार किया है कि अंतरात्मा की आवाज ईश्वर की आवाज है और यह बात किसी धर्म विशेष से सम्बंधित नहीं है|

खुश रहने का सीधा सा तरीका यह होता है कि हम अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें क्योंकि हमारी अंतरात्मा हमेशा हर परिस्थिति में सही होती है

हम जब कभी भी कुछ बुरा कर रहे होते है तो हमें कुछ अजीब सा लगता है मानो कोई हमें यह कह रहा हो कि वह बुरा काम मत करो| यह हमारी अंतरात्मा होती है जो हमें कुछ बुरा करने या किसी को दुःख पहुँचाने से रोकती है| और जब हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना कर देते है तो हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो जाता है|

जब हम दूसरी बार कुछ बुरा करने जा रहे होते है तो हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज फिर महसूस होती है लेकिन इस बार वह आवाज इतनी मजबूत नहीं होती क्योंकि हमारा अपनी अंतरात्मा से संपर्क कमजोर हो चुका होता है|

जैसे जैसे हम अपनी अंतरात्मा की आवाज को अनसुना करते जाते है वैसे वैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि हमें वो आवाज बिल्कुल नहीं सुनाई देती|

जैसे जैसे हमारा अपनी अंतरात्मा के साथ संपर्क कमजोर होता जाता है वैसे वैसे हम उदास रहने लगते है और खुशियाँ भौतिक वस्तुओं में ढूंढने लगते है| हम समस्याओं को हल करने में असक्षम हो जाते है जिससे “तनाव” हमारा हमसफ़र बन जाता है|

और ऐसी परिस्थिति में हमें स्वंय को वापस अपनी अंतरात्मा के साथ जोड़ना होता है और इसका सबसे अच्छा तरीका ध्यान या मैडिटेशन है|

Meditation – Technique of Self Control and Self Realization

जैसे जैसे हमें अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देना बंद होती है वैसे वैसे हमारा स्वंय पर नियंत्रण नहीं रहता और हम सही गलत को पहचानना नहीं पाते| ऐसी स्थिति मैं हम खुद को नियंत्रित नहीं करते बल्कि परिस्थितियां हमें नियंत्रित करती है| हम वो करने लगते है जो आलस्य, डर, तनाव, लालच, क्रोध, घमंड और इर्ष्या हमसे करवाते है|

मैडिटेशन खुद पर नियंत्रित रखने एंव Self Realization की एक पद्धति है जो हमारी जिंदगी को आसान एंव खुशमय बनाता है| मैडिटेशन से हमारा आत्मविश्वास और Concentration बढ़ता है जिससे हमारा समस्याओं के प्रति नजरिया बदल जाता है| हम समस्याओं को रचनात्मक तरीकों से बड़ी आसानी हल कर पाते है जिससे तनाव कम होता है|

Meditation: Connect With God

सभी महान लोगों ने यह माना है कि हमारी अंतरात्मा में एक अद्भुत शक्ति होती है | हम भी कभी कभी महसूस करते है कि शायद हमारी अंतरात्मा एक ईश्वरीय अंश है या फिर हमारी अंतरात्मा ईश्वर से हमेशा जुड़ी रहती है तभी तो वो हर परिस्थिति में सही होती है|

स्वामी विवेकानंद ने कहा है –

“आप ईश्वर में तब तक विश्वास नहीं कर पाएंगे जब तक आप अपने आप में विश्वास नहीं करते|”

इसलिए ईश्वर से जुड़ने से पहले हमें अपनी अंतरात्मा से जुड़ना होता है या यूं कहें कि जब हम अपनी अंतरात्मा से जुड़ जाते है तो उस अद्भुत ईश्वरीय शक्ति से स्वत: ही जुड़ जाते है और मैडिटेशन हमें अपनी अंतरात्मा से जोड़ता है|

लगातार रोज मैडिटेशन करने पर हमें अद्भुत अनुभव होने लगते है जिसे शब्दों द्वारा नहीं बताया जा सकता| हमें उन सवालों के जवाब मिलने लगते है जो अभी तक अनसुलझे थे| हमें ऐसा लगता है जैसे हमारे साथ एक शक्ति है जो हमेशा हमारी मदद करेगी|

Healing Power of Meditation: Happiness Unlimited

मन को शांत करने के लिए प्रयास करने की नहीं बल्कि प्रयास छोड़ने जरूरत होती है और यही ध्यान का उद्देश्य होता है|

मैडिटेशन मन की एक सहज अवस्था है जिससे हमारे भीतर का खालीपन दूर होता है| यह हमारी जिंदगी को बदल देता जिससे हम भौतिक वस्तुओं में खुशियाँ ढूँढना छोड़कर खुश रहना सीख जाते है| हमारे जीवन का हर पल खुशनुमा हो जाता है और हम वर्तमान में जीना सीख जाते है|

जब हमारा मन शांत एंव संतुष्ट होता है तो हमारा Concentration बढता है जिससे हम समस्याओं को बेहतर तरीके से हल कर पाते है और उन्ही समस्याओं में हमें संभावनाएं दिखने लगती है|

Healing Therapy: Meditation Can Cure Diseases

यह कहा जाता है कि ज्यादातर रोगों का कारण चिंता या तनाव (Stress) होता है| ध्यान के माध्यम से हम मन को सकारात्मक एंव तनावमुक्त बना सकते है जिससे की सकारात्मक उर्जा हमारे शरीर हमारे शरीर में प्रवेश करती है और हमारा शरीर स्वस्थ बनता है|

शोध में यह बात सामने आयी है कि Meditation और Healing Power कैंसर समेत कई रोगों में लाभकारी है और मैडिटेशन से कई तरह के रोगों को दूर किया जा सकता है क्योंकि ज्यादातर रोग Stress or Anxiety  की वजह से होते है और मैडिटेशन Stress or Tension को दूर करता है|

अहंकार की भाषा।


एक बहुत पुरानी तिब्बतन कथा है कि एक छोटा सा मच्छर था। आदमी ने लिखी, इसलिए छोटा सा लिखा है। मच्छर बहुत बड़ा था, मच्छरों में बड़े से बड़ा मच्छर था। कहना चाहिए, मच्छरों में राजा था, सम्राट था। कोई मच्छर गोबर के टीले पर रहता था, कोई मच्छर वृक्ष के ऊपर रहता था, कोई मच्छर कहीं। राजा कहां रहे, बड़ी चिंता मच्छरों में फैली। फिर एक हाथी का कान खोजा गया। और मच्छरों ने कहा कि महल तो यही है आपके रहने के योग्य।

मच्छर जाकर दरवाजे पर खड़ा हुआ, हाथी के कान पर। महान विशालकाय दरवाजा था–हाथी-द्वार। मच्छर ने दरवाजे पर खड़े होकर कहा कि सुन ऐ हाथी, मैं मच्छरों का राजा, फलां-फलां मेरा नाम, आज से तुझ पर कृपा करता हूं, और तेरे कान को अपना निवास-स्थान बनाता हूं। जैसा कि रिवाज था, मच्छर ने तीन बार घोषणा की। क्योंकि यह उचित नहीं था कि किसी के भीतर निवास बनाया जाए और खबर न की जाए। हाथी खड़ा सुनता रहा। मच्छर ने सोचा, ठीक है–मौनं सम्मति लक्षणम्। वह सम्मति देता है, मौन है।

फिर मच्छर वर्षों तक रहता था, आता था, जाता था। उसके बच्चे, संतति और बड़ा विस्तार हुआ, बड़ा परिवार वहां रहने लगा। फिर भी जगह बहुत थी। मेहमान भी आते, और भी लोग रुकते। बहुत काफी था।
फिर और कोई जगह सम्राट के लिए खोज ली गई और मच्छरों ने कहा कि अब आप चलें, हम और बड़ा महल खोज लिए हैं। तो मच्छर ने फिर दरवाजे पर खड़े होकर कहा कि ऐ हाथी सुन, अब मच्छरों का सम्राट, फलां-फलां मेरा नाम है, अब मैं जा रहा हूं। हमने तुझ पर कृपा की। तेरे कान को महल बनाया।

कोई आवाज न आई। मच्छर ने सोचा, क्या अब भी मौन को सम्मति का लक्षण मानना पड़ेगा? अब भी? यह जरा दुखद मालूम पड़ा कि ठीक है, जाओ, कुछ मतलब नहीं। वह हां भी नहीं भर रहा है, न भी नहीं भर रहा है। उसने और जोर से चिल्ला कर कहा, लेकिन फिर भी कुछ पता न चला। उसने और जोर से चिल्ला कर कहा। हाथी को धीमी सी आवाज सुनाई पड़ी कि कुछ…। हाथी ने गौर से सुना, तो सुनाई पड़ा कि एक मच्छर कह रहा है कि मैं सम्राट मच्छरों का, मैं जा रहा हूं, तुझ पर मेरी कृपा थी, इतने दिन तेरे कान में निवास किया। क्या तुझे मेरी आवाज सुनाई नहीं पड़ती है? हाथी ने कहा, महानुभाव, आप कब आए, मुझे पता नहीं। आप कितने दिन से रह रहे हैं, मुझे पता नहीं। आप आइए, रहिए, जाइए, जो आपको करना हो, करिए। मुझे कुछ भी पता नहीं है।

तिब्बतन फकीर इस कथा को किसी अर्थ से कहते हैं। आदमी आता है। दर्शन, फिलासफी, धर्म, मार्ग, पथ, सत्य, सिद्धांत, शब्द निर्मित करता है। चिल्ला-चिल्ला कर कहता है इस अस्तित्व के चारों तरफ कि सुनो, राम है उसका नाम! कि सुनो, कृष्ण है उसका नाम! आकाश चुप है। उस अनंत को कहीं कोई खबर नहीं मिलती। हाथी ने तो मच्छर को आखिरी में सुन भी लिया, क्योंकि हाथी और मच्छर में कितना ही फर्क हो, कोई क्वालिटेटिव फर्क नहीं है। क्वांटिटी का फर्क है; मात्रा ही का फर्क है। हाथी जरा बड़ा मच्छर है, मच्छर जरा छोटा हाथी है। कोई ऐसा गुणात्मक भेद नहीं है कि दोनों के बीच चर्चा न हो सके। हो सकती है, थोड़ी कठिनाई पड़ेगी। मच्छर को बहुत जोर से बोलना पड़ेगा, हाथी को बहुत गौर से सुनना पड़ेगा। लेकिन घटना घट सकती है, असंभव नहीं है।

लेकिन अस्तित्व और मनुष्य के मन के बीच कोई इतना भी संबंध नहीं है। न हम आते हैं, तब उसे पता चलता है कि हमने बैंड-बाजे बजा कर घोषणा कर दी है कि मेरा जन्म हो रहा है। न हम मरते हैं, तब उसे पता चलता है। हम आते हैं और चले जाते हैं। पानी पर खींची रेखा की भांति बनते हैं और मिट जाते हैं। लेकिन इस थोड़ी सी देर में, जब कि रेखा बनने और मिटने के बीच में थोड़ी देर बचती है, उतनी थोड़ी देर में हम न मालूम कितने शब्द निर्मित करते हैं। उस बीच हम न मालूम कितने सिद्धांत निर्मित करते हैं। उस बीच हम न मालूम कितने शास्त्र बनाते हैं, संप्रदाय बनाते हैं। उस बीच हम मन का पूरा जाल फैला देते हैं।

ताओ उपनिषद

Saturday, October 26, 2019

You can be your own counselor





आप धीरे धीरे मरने लगते हैं।

*नोबेल पुरस्कार विजेता ब्राजीली कवियत्री  मार्था मेरिडोस की कविता "You Start Dying Slowly" का हिन्दी अनुवाद..*

1) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:*
- करते नहीं कोई यात्रा,
- पढ़ते नहीं कोई किताब,
- सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
- करते नहीं किसी की तारीफ़।

2) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप:*
- मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
- नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।

3) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:*
- बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के, 
- चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
- नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
- नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
- आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।

4) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:*
- नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।

5) *आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप:*
- नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
- अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
- अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
- अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की..।
*तब आप धीरे-धीरे मरने  लगते हैं..!!*

*इसी कविता के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

एक राजा का बोलना।

एक स्थान पर वाक शक्ति के बारे में बात करते हुए चाणक्य ने लिखा है कि राजा को एक बार ही बोलना चाहिए।
उन्होंने अर्थ स्पष्ट किया है कि आदेश देने के अधिकारी व्यक्ति को कम शब्दों में पूरी बात स्पष्ट रूप से कह कर निर्देश दे देना चाहिए।
किसी भी बात  को कहने में जब बहुत सारे शब्द लगे या बहुत देर तक कहना पड़े तो तीन खामियां स्पष्ट हो जाती है।
पहली की कहने वाला आदेश देने की वास्तविक अधिकारी नही है।
दूसरा, वह खुद अपने स्तर पर तय नही कर पा रहा कि आदेश और निर्देश कैसे हो। और तीसरा की उसमे इच्छा शक्ति और मजबूती का जबरदस्त अभाव है।
कहते है की वादे भी वहीं कर सकते है, जो अपनी बात पर कायम रहने का माद्दा रखते है। अपनी बात से मुकरना, छबि को ही नहीं, आत्मा को भी कमजोर बनाता है।
जो लोग अल्पभासी होते है या जो अपनी बात पर टिके रहकर दूसरे के उम्मीदों का ख्याल रखते है, उनकी प्रतिष्ठा अलग ही होती है। कम बोलने वालो से लोग उलझते भी कम है ।
उनके पास अपनी मजबूती के लिए शब्दों का भंडार होता है, पर वे उसका भी बेहद कंजूसी से, संभलकर इस्तेमाल करते हैं। 

एक सवाल अतीत से!


अपने आप को भूतकाल में ले जाइए। अपने आप से सवाल कीजिए कि, क्या आपने जो भविष्य के डर के( असुरक्षा- हानी)  लिए... अपनी चिंताओं के लिए, दुश्चिंताओं के लिए, जो कीमत चुकाई थी। क्या वो वाजिब कीमत था? या आवश्यकता से अधिक कीमत चुकाई?
जब भी आप अपने से ऐसे सवाल करेंगे, हर बार उतर यही आएगा की जो कीमत हमने चुकाई थी वो बिल्कुल  गैरवाजिब था। बहुत ज्यादा था। हमें उतना चिंता नहीं करनी चाहिए थी। और हर बार आप पाएंगे की पहले की तुलना में आज बेहतर स्थिति है मेरी।
आज वही कल है जिस कल की फ़िक्र तुम्हे कल थी।

हर बार ऐसा ही होता है, बिना अपने क्षमताओं को जाने, और धारणाओं में बंध कर हम ऐसे बेवजह के " क्या होगा मेरा, कैसे होगा, फॉला काम होगा या नहीं या फिर मेरे जिंदगी का क्या होगा आदि दुश्चिंताओं से घिर जाते है ।
क्या आपने कभी सोचा कि हमारी शब्द जिससे हम अपने जीवन को परिभाषित कर रहे है वे पुराने है - धारणाओं के आधार पर आए है - जितनी हमारी समझ और ज्ञान है,, उस आधार पर आए है  और हमारी जीवन रोज बदल रही है। परिस्थितियां बदल रही है। जीवन रोज एक नया सवेरा - नई चेतना के साथ हमारे सामने आ रहा है ।
भविष्य को सही सही परिभाषित वहीं कर सकता है जो सतत गतिशील है जीवन के प्रवाह में, जिसके अंदर धारणाओं के रूप में कुरा कचरा नहीं भरा है,और जो रोज प्राप्त होने वाली जीवन ऊर्जाओं का कर्म के रूप में उपयोग करता है ।
हम चाहते क्या है। इस विषय से जब भी अनजान हुए तो मन की डावाडोल स्थिति परेशानियों को आमंत्रित करने लगती है।
परेशानियों में घिरे रहने के भी दो कारण होते है ।
हमारी अज्ञान जो की हो सकता है कि अवसर को भी परेशानियों के रूप में प्रकट करे।
और हमारी कर्मफल। कष्टों का हमारा अनुभव कुछ पुराने कर्मो का बाई प्रोडक्ट होता है जो कि आपको अपने कर्म का कर्ज चुकाने के साथ ही स्वतः खतम होती जाती है।

हमारे जीवन में परेशानियों के होने में हर्ज नहीं है, क्योंकि परेशानियों हमेशा से थी और हमने उन परेशानियों को सफलतापूर्वक जीता भी था, और उनसे आगे भी गए थे।
अपने जीवन को मुड़कर भूतकाल की तरफ देखे की कितनी चुनौतियों का सामना आपने किया था, और कैसे आप चुनौतियों और परेशानियों को हराते हुए आगे बढ़ गए थे।
जब भी हम परेशानियों में होते है उस समय नकारात्मक ऊर्जाओं से घिरे होते है, उस समय हमारी चेतना सहज ही दूसरे से तुलना करने लगती है, जैसे फल्ला को देखो - कितने भ्रष्ट है और गलत काम करते है फिर भी तेजी से आगे बढ़ रहे है और खूब सारा पैसा भी कमा रहे हैं।
आप जानते भी क्या है उनके बारे में ? कितना जानते है? हो सकता है उनके पास बहुत सारा पैसा हो और रातो को नींद नहीं आती हो। हो सकता है उनकी  शारीरिक  स्वास्थ्य बिगड़ती चली जा रही हो। हो सकता है उनका परिवार उनके कर्मो से तबाह हो रहा हो ।
आप उनके कष्टों को नहीं जानते । लोग किसी भी तरह पैसा तो कमा लेते है और शीर्ष पर भी पहुंच जाते है फिर वही से उनका पतन भी होना शुरू हो जाता है, विभिन्न माध्यमों से।
क्या ऐसा आपके अनुभव में नहीं हैं? वैसे लोग  जो ऊपर तो पहुंच जाते है गलत मार्ग से फिर क्या उनका पतन होना आपने नहीं देखा है ?

                                           
                                     

रामलीला

मैंने सुना है, एक गांव में रामलीला हो रही थी; और जो रावण बना था और जो स्त्री सीता बनी थी, वह वस्तुतः उसके प्रेम में था। तो जब शिव का धनुष तोड़ने की बारी आई तो बाहर आवाज गूंजती है राज-मंडप के, कि लंका में आग लगी है। रावण को जाना चाहिए। वह चला जायेगा, इस बीच राम धनुष को तोड़ लेंगे, विवाह हो जायेगा, कथा चलेगी। वह रावण जो था, उसने कहा, 'लगी रहने दो आग! जल जाये लंका! आज मैं यहां से जानेवाला नहीं।' बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई; क्योंकि वह तो नाटक था और इसके पहले कि कोई रोक-टोक कर सके, परदा गिराये, वह उठा और उसने धनुष तोड़कर रख दिया। वह धनुष कोई शिवजी का धनुष तो था नहीं! साधारण बांस का धनुष था, उसने तोड़कर रख दिया।
जनक सिंहासन पर बैठे घबड़ाए। वह सारी कथा ही उसने खत्म कर दी।
उसने कहा, 'कहां है तेरी सीता? निकाल! आज तो विवाह होकर रहेगा।'
अब उसका अगर विवाह हो जाये, तो आगे सब उपद्रव! जनक तो बूढ़ा आदमी था, लेकिन पुराना कुशल अभिनेता था। उसने तत्क्षण रास्ता निकाला। उसने कहा, 'भृत्यो! यह तुम मेरे बच्चों के खेलने का धनुष उठा लाए, शिवजी का धनुष लाओ।'
तब परदा गिराकर रावण को बाहर करना पड़ा, दूसरे आदमी को रावण बनाना पड़ा। क्योंकि उस आदमी ने नाटक का नियम... नाटक तो नियम से चलता है!
जिस समाज में तुम जी रहे हो, वह एक बड़ा नाटक है। वहां मंच बड़ी है। वहां दर्शक कोई है ही नहीं, सभी अभिनेता हैं। वहां तुम्हें नियम मानकर चलना पड़ेगा। वहां तुम जान भी लो कि यह धनुष शिवजी का नहीं है तो भी तोड़ना मत; अन्यथा तुम्हारे जीवन में कठिनाई होगी, सुविधा नहीं होगी; और भीतर के प्रकाश की खोज में मुश्किल पड़ जायेगी।
इसलिये पतंजलि ने, महावीर ने, बुद्ध ने जो शील के नियम कहे हैं, वे सिर्फ इसलिये कहे हैं ताकि तुम समाज के साथ अकारण उपद्र्रव में न पड़ो; अन्यथा तुम्हारी शक्ति झगड़े में नष्ट होगी। भीतर की खोज कौन करेगा? बुद्ध, पतंजलि के कारण भारत में कभी क्रंाति नहीं हुई। क्योंकि बुद्ध और महावीर और पतंजलि ने कहा कि अगर तुम क्रांति में पड़ोगे, तो भीतर की क्रांति में कौन जायेगा? और असली क्रंाति वहां है। इन छोटे-छोटे नियम को बदलने से कि नहीं, बायें चलना ठीक नहीं, दायें चलेंगे...!
च्वांगत्से एक छोटी-सी कहानी कहता था। च्वांगत्से कहता था कि एक गांव में एक सर्कस था। सर्कस का मैनेजर था, मैनेजर के पास बंदर थे। उन बंदरों को वह सर्कस में खेल दिखलाता था। बंदरों को रोज सुबह चार रोटी दी जाती थीं, शाम को तीन रोटी दी जाती थीं। एक दिन ऐसा हुआ कि रोटियां थोड़ी कम पड़ गईं तो मैनेजर ने कहा सुबह कि बंदरो! तीन ले लो, शाम को चार दे देंगे। बंदर एकदम नाराज हो गए। उन्होंने बहुत शोरगुल मचाया, उछल-कूद की। उन्होंने कहा कि नहीं, यह नहीं चलेगा। यह बर्दाश्त के बाहर है। सदा हमें चार मिलती रही हैं। उसने बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन बंदर, तो बंदर! बहुत समझाने की कोशिश की कि चार और तीन सात ही होते हैं। चाहे सुबह चार लो कि तीन लो, चाहे शाम को चार लोगे, तो बंदरों ने कहा कि यह फालतू बातें हमसे मत करो। चार हमें सदा मिलती रही हैं, चार हमें चाहिये। जब उन्हें चार रोटियां दे दी गईं, बंदर एकदम प्रसन्न हो गए। सांझ को तीन रोटियां मिलीं, वे प्रसन्न थे। कुल मिलाकर वे सात थीं।
करीब-करीब क्रंातियां ऐसी ही हैं--सभी क्रंातियां! उसमें सुबह चार मिलनी चाहियें, तीन नहीं लेंगे; कि शाम को चार मिलनी चाहिये, तीन नहीं लेंगे; लेकिन अंततः जोड? बराबर सात होता है। कोई फर्क नहीं पड़ता। समाज के जीवन में कोई बुनियादी फर्क नहीं पड़ते हैं, बुनियादी क्रांति तो व्यक्ति के जीवन में घटित होती है। इसलिये पतंजलि ने कहा कि तुम इन सब नियमों को मानकर चलना ताकि समाज के साथ व्यर्थ की कलह खड़ी न हो। अन्यथा समाज बड़ा है और तुम कलह में ही नष्ट हो जाओगे। इसलिये विद्रोही व्यक्ति अकसर सत्य को उपलब्ध नहीं हो पाते; न शांति को उपलब्ध हो पाते हैं; क्योंकि वे छोटी-छोटी बातों में लड़ रहे हैं, छोटी-छोटी बातों में उलझ रहे हैं। अगर बदलाहट भी हो जायेगी तो इतना ही फर्क पड़ेगा कि शाम को तीन रोटी, सुबह चार मिलेंगी; और कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है। लेकिन तुम्हारा जीवन खो जायेगा।
समाज के साथ एक समझौता है इन नियमों में, कि हम तुम्हारे खेल का नियम मानकर चलते हैं, तुम हमें परेशान न करो। ताकि हम अपने भीतर प्रवेश कर सकें। तुम हमें बाधा न दो। जब समाज आश्वस्त हो जाता है कि तुम्हारा आचरण ठीक है, समाज बाधा नहीं देता। तुम उसका नियम मानकर चल रहे हो, फिर तुम ध्यान में जाओ, संन्यास में जाओ, तुम गहरी प्रज्ञा में प्रवेश करो, वह बाधा नहीं देता बल्कि साथ देता है। एक दफा उसे पता चल जाये कि तुम उपद्रव खड़ा करते हो, तुम नियम तोड़ते हो, तो वह तुम्हारा दुश्मन हो जाता है।
हम बुद्ध को सूली पर नहीं चढ़ाए, न महावीर को सूली पर चढ़ाए। चौबीस तीर्थंकर भारत में हुए, बिना सूली चढ़े चल बसे। बुद्ध, रामकृष्ण को किसी को हमने सूली पर नहीं चढ़ाया। जीसस को सूली लग गई। उसका कुल कारण इतना था कि जीसस ने कुछ अजनबी प्रयोग कर लिया वहां। जीसस ने समाज के छोटे-मोटे नियमों की खिलाफत कर दी। अगर जीसस ने पतंजलि के सूत्र पढ़े होते, सूली नहीं लगती। छोटी-मोटी बातों पर झगड़ा खड़ा कर लिया। उस झगड़े के कारण कोई परिणाम अच्छा नहीं हुआ। उस झगड़े के कारण लाखों लोग लाभ ले सकते थे जीसस के दीये का, वे वंचित रह गये। और सूली लग जाने की वजह से, जीसस के पीछे जो अनुयायियों का वर्ग आया, वह सूली से प्रभावित होकर आया। वह गलत था। वह जीसस की प्रज्ञा से प्रभावित नहीं हुआ, सूली से प्रभावित हुआ कि महान शहीद हैं। इसलिये क्रिश्चियनिटी बुनियाद में पॉलिटीकल हो गई, राजनैतिक हो गई।
वही भूल इस्लाम के साथ हो गई। मोहम्मद ने छोटी-छोटी बातों में बदलाहट करने की कोशिश की। उसकी वजह से मोहम्मद को चौबीस घंटे तलवार लिये खड़ा रहना पड़ा। और जब मोहम्मद ने तलवार ले ली तो फिर अनुयायी तो तलवार छोड़ ही नहीं सकता। तो फिर यह चौदह सौ वर्ष से मुसलमान तलवार लिये घूम रहे हैं, क्षुद्र बातों की बदलाहट के लिए। जिनका कोई मूल्य नहीं है, वह बदल भी जायें तो भी कोई मूल्य नहीं है।
यह जो च्वांगत्से की कथा है, यह बड़ी मीठी है। इस कथा का नाम है, 'दी ला आफ सेवन', सात का सिद्धांत। समाज की व्यवस्था कुल जोड़ में वही रहेगी। तुम सिर पटककर यहां-वहां तीन की जगह चार, चार की जगह तीन कर लोगे, लेकिन पूरे जोड़ में कोई फर्क पड़नेवाला नहीं है। और उचित यही है कि तुम्हारी पूरी जीवन-ऊर्जा अंतःप्रवेश करे, तो तुम व्यर्थ के संघर्ष में न पड़ो। तुम छोटी बातों में मत उलझो।
समाज से अकलह की स्थिति रहे इसलिए पतंजलि का यम-नियमों पर जोर है। और जिस व्यक्ति को धार्मिक क्रांति करनी है, उसे सामाजिक क्रांति से जरा बचना चाहिए। क्योंकि इन दोनों क्रांतियों का मेल नहीं होता है। सामाजिक क्रांतिकारी बाहर के जगत में भटक जाता है। वह अपने तक पहुंच ही नहीं पाता। उसका दीया अपरिचित ही रह जाता है।
इसलिये शील को मानकर चलना, आचरण को मानकर चलना। और जिस समाज में जाओ, उसके शील और आचरण को मान लेना; ताकि तुम्हारी ऊर्जा व्यर्थ संघर्ष में व्यय न हो और तुम्हारी पूरी ऊर्जा अंतर्मुखी हो सके।
संघर्ष बहिर्मुखता है, साधना अंतर्मुखी है। ओशो.

यादें

और अंत में हमारे लिए जो सबसे कीमती होता है उसी को हम खो देते हैं और बच जाती है वो पल पल की यादे अहसास और उपस्थिति का छायाचित्र। वक़्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता  है- जरुरते, ख्वाहिशें, लोग भी और हम खुद भी।
सब अपने जीवन पथ पर जिम्मेवारियों को संभालने के लिए आगे बढ़ जाते है और उन जिम्मेवारियों के पहाड़ तले कहीं किसी कोने में वह कोमल सी मीठी पारिजात दबी पड़ी रहती है। फिर एक दिन वह भी मिट्टी के रंग में मिलकर पत्थरों के चारो बगल अदृश्य सा फैल जाती है। कभी फुर्सत के क्षणों में पीछे मुड़कर देखने पर उसकी एक झलक मिल जाती है। कभी सपनो में आकर मुस्कुराते हुए उन पहाड़ों को ढोने के लिए नई ऊर्जाआे का संचार भी कर देती है। बीतते समय के साथ कोई तूफानी बारिश उन पारिजात मिले मिट्टी को पत्थरों  से हमेशा हमेशा के लिए अपनी तेज धार से धो देती है। और फिर बीज रूप में अवचेतन में रहते अंकुरित होने की लालशा लिए अगले जन्म तक का इंतज़ार...
समय गुजरने के साथ हम वो नहीं रहते जो कभी थे, समय के साथ अब हम वो हो जाते है जो खुद के लिए भी पहचान पाना मुश्किल होता है...