दिन की शुरुआत
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सुबह सो कर उठा तो बीती रात का आखिरी विचार जो नींद आने के पहले मन पर कब्ज़ा जमाए था, वो फिर से अपने अस्तित्व का याद दिलाया कि मै जिंदा हूं।
विचार प्रेम का हो, विचार सकारात्मक हो तब तो अलसाया सुबह भी ऊर्जा से भर देता हैं। सूर्य भगवान मुस्कुराते नजर आते हैं, पूरा दिन कुछ ना कुछ पारितोषिक देते जाता हैं और शाम उस पारितोषिक का निचोड़ लिए, कई रंगबिरंगे रौशनियों को एक साथ जलाएं हूबहू उस नाइट क्लब की तरह सुकून देता हैं जिसमें रौशनियो का मतलब ही सुकून देने वाला अंधेरा होता हैं। शाम अंधेरों में घिरती हैं, अंदर की बची हुई ऊर्जाएं भी अपना रूप बदलते जोरदार भूख का आभास देते पाचन तंत्र के जिंदा होने का प्रमाण देती हैं।
रात का आखिरी विचार... विचार जो कर्मो की नीव होते हैं, बिना विचार के कर्म संभव ही नहीं। पहले विचार ही अस्तित्व में आता हैं फिर वही विचार अपने अनुरूप कर्म करने को बाध्य करता हैं।
कभी ऐसा भी था कि रात के आखिरी विचार दुश्चिंताओं से भरे डराने वाले होते थे। सेडक्टिव दवाओं के प्रभाव से जबरदस्ती का नींद तो आता था मगर रात भर वही विचारे अपना फन उठाएं सपनों के रूप में अंतरमन को जगाएं रखती थी। सुबह भी होता था... वैसा ही दिलकश- जैसा बचपन में छठ घाट पर महसूस होता था! मगर विचारों द्वारा समस्त ऊर्जा को चूस लिए जाने के कारण सुबह भी नीरस- उदासीन दिखती थी। सुबह- दोपहर- शाम - रात बिना ऊर्जाओं के जिए चले जाते हैं। रात का आखिरी विचार तरह- तरह का रूप बदलता, एक से हजार रूप में सामने आता हैं और फिर भ्रम पैदा करते वास्तविकता को ढंक लेता है।
वास्तविकता के ओझल होते ही हर बात- व्यवहार में भ्रम का साम्राज्य कायम होता हैं। हर रोज - दिन यह प्रगाढ़ होते चला जाता हैं। हमारे होने की हर स्थिति हमे सहज लगती हैं - बीमार हैं तो बीमारी सहज लगने लगती हैं, स्वस्थ्य हैं तो स्वास्थ्य सहज लगता हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब कोई बीमार स्वस्थ्य होना शुरू होता हैं और उसे स्वास्थ्य असहज लगने लगता हैं।
किसी भी चीज की चरम स्थिति या तो उब पैदा करती हैं या अपने रंग में रंग लेती हैं।
नकारात्मकता- दुश्चिंताओं- डर ने मेरे अंदर ऊब पैदा किया था और उसे परे कर जीवन को देखने का इशारा किया था।
सूत्र हाथ लग चुका था - रात का आखिरी विचार जैसा होगा वैसा ही दिन - रात - सप्ताह और महीना बीतता चला जाएगा। ऊब पैदा होने से हम चिजो को बदल डालने के लिए व्यग्र तो होते हैं, प्रोत्साहित भी होते है... मगर मन बने- बनाएं आरामदायक स्थिति से बाहर आना नहीं चाहता। आरामदायक स्थिति तोड़ने में काफी दर्द होता है, जिसे मन के ऊपर जाकर लक्ष्य हासिल करना पड़ता हैं।
हम क्या चाहते हैं यह हमें मोटिवेट करता हैं मगर उस लक्ष्य को पाना अनुशासन पर ही निर्भर करता हैं। अनुशासन यह की - हर रात का आखिरी विचार सकारात्मक होगा। मन- शरीर में रच- वस चुके नकारात्मक ऊर्जा को हर सुबह व्यायाम द्वारा फेफड़ों में ऑक्सीजन भर कर बाहर करेंगे। मेडिटेशन द्वारा अंतरमन को साफ रखेंगे।
दीपावली की शुभकामनाएं