Friday, December 31, 2021

वे आखिरी घंटे

दिन गुजर गए, हम किधर गए, पीछे मुड़ कर देखा तो पाया, सब ठहर गए। 
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इस साल की कुछ आखिरी घंटे बचे हैं। ये आखिरी कशमकश, कसमसाहट पीछे लिए जा रही है। विदा होने की बेचैनी ढेर सारा बात करना चाहती हैं। बहुत कुछ याद करना चाहती है। उसे भी जिसपर धूल जम चुके है मगर कभी सीने से लगा रखे थे। वे अजनबीपन से शुरू हुआ सफर, वे गलियां, बाज़ार की ट्रैफिक, धीमी रोशनी वाली टेबल, उसकी हड़बड़ाहट।  सफर के बाद की ताजगी। उसकी मुस्कुराहट। सुबह के ओस में भीगी उसकी कोमलता। उसके साथ मिलने वाला सुकून।  खिलखिलाता हुआ दिन, वो चांद वाली चमकती रात। रात में शहर का खाली हो जाना। चांद भी परेशान कि आखिर देर रात तक जागता कौन है? और सोता कौन है? -आसमान। वे नींद से खाली रातें- काली- डरावनी रात। दोपहर की तपिश। ठंड की ठिठुरन और सूनी रातें। बरसात में उसका भीगना और उस पानी का मेरी आंखो में आना! कितना कुछ छूट रहा। अकेला खड़ा बादल की तरह मैं इस बचे हुए कुछ घंटो को पकड़ने खातिर बरस पड़ा हूं। 
अन्तिम मुलाकाते, आखिरी बार पीछे मूड कर देखना पास खींच लाता हैं। मैं पीछे-पीछे हो लेता हूं। शायद उसे जाने देना नहीं चाहता। संवेदना चरम पर होती है, तब उसके पांव भी धीमे पड़ने लगते है। मगर जाने देना भी प्रेम है। 
ये आखिरी घंटे बस इतना ही कहना चाहते है- हमारे प्यार को इस शहर से कभी जुदा मत करना।
 अजनबी सफर कि शुरुआत अधूरेपन के साथ होने वाली है। और इश्क़ में अजनबी ना रहे तो इश्क कैसा? अधूरेपन के साथ वाला सफर भी इतना खाली होता है कि अपने अंदर कुछ जोड़ने का ख्याल भी बेचैन कर जाता हैं। आखिर कोई अपनी तन्हाई यूं ही हाथ से नहीं जाने देना चाहता। 
इन आखिरी बचे कुछ पलों को पता है कि उन्हें चुप-चाप बिदा हो जाना है, जैसे पेड़ से पते कहीं खो जाते है- बिना किसी पछतावा के।  
आखिरी बचे कुछ घंटे मेरे साथ खामोश हो चले है। इश्क में खामोशी ही बोलती है।

Tuesday, April 27, 2021

मूर्ख

क्या सुकरात और क्या शेक्सपीयर ! दोनों ने एक ही बात अलग-अलग शब्दों में कही और क्या ख़ूब कही ! प्लेटो हमें बताते हैं कि उनके गुरु सुकरात कहते हैं कि मैं केवल एक ही बात जानता हूँ कि मैं नहीं जानता। मैं अपने अज्ञान को जानता हूँ। शेक्सपीयर'ऐज़ यू लाइक इट' नाटक में यही बात कहते हैं : "मूर्ख स्वयं को विवेकवान् समझता है किन्तु विवेकवान् स्वयं को मूर्ख। यही विवेकी और मूर्ख में भेद है।"

हिन्दी की कहावत 'अधजल गगरी छलकत जाए' को ले लीजिए। गगरी में जल कम होगा , तो वह छलकेगी। छलकने में गगरी का ज्ञानोल्लास है। गगरी को यह लगता है कि वह भर चुकी है। किन्तु छलकना बिना हवा की मौजूदगी के हो ही नहीं सकता। छलकन के लिए जल के साथ वायु का होना आवश्यक है। ज्यों-ज्यों जल भरता जाता है , गगरी छलक छोड़कर शान्त होती जाती है। 

मनोवैज्ञानिक डेविड डनिंग और जस्टिन क्रुगर हमें एक प्रभाव के बारे में बताते हैं। उन्हीं के नामों पर इसे डनिंग-क्रुगर प्रभाव कहा गया है। यह एक कॉग्निटिव बायस यानी बौद्धिक पक्षपात की स्थिति है। व्यक्ति स्वयं की अक्षमता को जानता ही नहीं। वह मान ही नहीं पाता कि वह जिस विषय में जानने का दावा कर रहा है , उस विषय में वह कुछ नहीं जानता। उसकी जानकारी अधूरी और ग़लत है। लेकिन उससे यह कहिएगा , तो वह मानेगा नहीं। बहस करेगा। लड़ जाएगा। मैं और अक्षम ! अक्षम होंगे आप ! 

किसी मूर्ख ने एक बैंक लूटने की सोची। बन्दूक लेकर चल दिये बैंक लूटने। नक़ाब-वकाब पहना नहीं। कैमरों में चित्र आ गये। पुलिस ने उन फोटोग्राफ़ों के माध्यम से मूर्ख को धर दबोचा। पकडे जाने पर मूर्ख ने कहा कि मैंने तो नींबू का रस मला था अपने ऊपर , फिर कैसे पकड़ में आ गया मैं ! 

ढेरों लोगों के अन्दर विज्ञान की हल्की-फुल्की समझ होती है। मूर्ख में भी थी। उन्हें पता था कि नींबू के रस के कुछ लिखा जाए , तब वह अदृश्य रहता है जब तक उसे गर्मी न दी जाए। गर्मी से नींबू के रस से लिखे अक्षर प्रकट हो जाते हैं। मूर्ख ने अपनी देह पर नींबू का रस मला। यह सोचकर कि इससे उनका शरीर भी कैमरों के लिए अदृश्य हो जाएगा और वे लूट के दौरान दिखेंगे नहीं। इस काम को पहले उन्होंने अपने कैमरे पर आज़माया भी। कैमरे में कदाचित् कोई त्रुटि थी , उनका चित्र नहीं खिंच सका। नतीजन वे आत्मविश्वास से भर गये। नींबू मलो , बैंक लूटो। फ़ोटो खिंचेगी ही नहीं , पुलिस कुछ न कर पाएगी ! 

आप मूर्ख पर हँस सकते हैं। मैं भी हँसा था। पर मूर्ख एकदम आत्मविश्वास से भरपूर हैरानी से यह सोच रहे थे कि चूक कहाँ हुई। नींबू के रस को मलने वाला व्यक्ति दिख कैसे गया कैमरे में ! मूर्ख पागल नहीं था। वे मूर्ख आत्मविश्वासी थे। ऐसे मूर्ख आत्मविश्वासी आपको जीवन के हर मोड़ पर रोज़ मिला करते हैं। 

मूर्खता अपने साथ आत्मविश्वास लाती है। अपनी योग्यता पर ऐसा यक़ीन , जैसा बड़े-बड़े ज्ञानियों को नहीं होता। बल्कि मामला उलटा देखने को मिला करता है। ज्ञानी में भरपूर सन्देह विद्यमान् रहता है , जबकि मूर्ख अशंक भाव से एकदम निश्चिन्त रहा करता है। मूर्ख सभी हैं। ज्ञानी भी सभी हैं। हम-सब के भीतर मूर्खता और ज्ञानवत्ता , दोनों हैं। अन्तर केवल प्रतिशत का है। अब मान लीजिए कि हम प्रयासों से मूर्खता को घटाने में लग जाते हैं। ज्ञान जमा करते हैं। शुरू में जितना ज्ञान बढ़ता है , आत्मविश्वास बढ़ता है। अधिक अज्ञान , अधिक आत्मविश्वास। यह दृढ़ होता जाता है। हम जान गये ! एकदम जान गये ! और क्या जानना होता है ! यही तो जानना है ! 

ढेरों लोग ज्ञान-प्राप्ति के क्रम में यहीं कहीं रुक जाते हैं। थोड़ा अधिक ज्ञान और उसी अनुपात में आत्मविश्वास से भरपूर मन। वे यह समझ ही नहीं पाते कि अभी उनमें मूर्खता भरपूर है। लेकिन जो इस ज्ञान-प्राप्ति में आगे बढ़ते हैं , उनमें दूसरा बदलाव मिलता है। उनका आत्मविश्वास पहले से कम होता है। वे जितना अधिक जानते और सीखते जाते हैं , उस अनुपात में आत्मविश्वास नहीं बढ़ता। बल्कि घटता है। उनमें सन्देह का भाव जन्मने लगता है। 

फिर एक स्थिति आती है। जब यह ज्ञान अत्यधिक हो जाता है , तब फिर आत्मविश्वास में वृद्धि मिलने लगती है। लेकिन यह वृद्धि पिछली वृद्धि की तरह तीव्र नहीं , मद्धिम होती है। आहिस्ता-आहिस्ता। इसमें अज्ञानी के नवज्ञानी बनते समय जो आत्मविश्वास का उछाल देखने को मिलता है , वह नहीं मिलता। यह वृद्धि शनैः शनैः बढ़ती जाती है। सन्देह का स्थान किन्तु फिर भी बना रहता है। 

मूर्ख व्यक्ति उस चिराग की तरह है , जिसके तल पर ही अँधेरा है। किन्तु उसे स्वयं वह अन्धकार नहीं दीख रहा। उसे लगता है कि वह ज्योतिर्मय हो चुका है। जबकि उसके आधार पर ही अन्धकार एकत्रित है और हटने का नाम नहीं ले रहा। मूर्खता यह जानती और मानती ही नहीं कि वह मूर्ख है : ज्ञानी अपने भीतर की मूर्खता के अंशों को पहचाना करता है। 

वर्तमान कोरोना-काल में ऐसे कॉन्सपिरेसी-प्रेमी मूर्ख आपको नित्य मिलेंगे। वे जो विज्ञान को या तो जानते नहीं अथवा बहुत कम जानते हैं। विज्ञान की उनकी जानकारियाँ ह्वाट्सऐप या फ़ेसबुक की जानकारियों तक सीमित हैं। ये जानकारियाँ भी विवादास्पद या भ्रमात्मक हैं। इनके पीछे विज्ञान है ही नहीं अथवा विज्ञान की भाषा और शैली में अन्धविश्वास बैठा है। 

मूर्ख होने पर इंसान का बस नहीं। मूर्ख हम-सब हैं। पर अपनी-अपनी मूर्खताओं की पहचान हमें होनी चाहिए। यह जानना ज़रूरी है कि क्या हम नहीं जानते और क्या हम नहीं जान सकते। लेकिन ज्ञान और बुद्धि का परिसीमन करने में जो बार-बार चूकते हैं , वे मूर्ख सुकरात और शेक्सपीयर की नज़र में सच्चे मूर्ख हैं। वे नहीं जानते कि वे नहीं जानते , लेकिन आप से लड़ जाएँगे। कोरोनावायरस तो क्या , वे किसी वायरस का एबीसीडी नहीं जानते। अथवा बहुत सीमित ज्ञान रखते हैं। लेकिन वे अपने-आप को बड़े-बड़े विषाणु-वैज्ञानिकों से भी अधिक ज्ञानी समझते हैं। 

ऐसी आत्मविश्वासी मूर्खता जोखिम ले सकती है। ऐसी अविवेकी मूर्खता हिंसा कर सकती है। ऐसी अज्ञानी मूर्खता कोविड-19 के दौरान दिन-दुगुनी-रात चौगुनी बढ़ी है।

Friday, March 26, 2021

मेंटल डिसऑर्डर

मैथोमानिया या स्यूडोलॉजिया फँसटास्टिका, एक साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर है। इसका लक्षण है- झूठ बोलना, लगातार, बिना किसी उद्देश्य के.. 

झूठ सभी बोलते है, अमूमन किसी गलती की सजा से बचने या किसी को हर्ट करने से  बचने के लिए। इसमे शारीरिक प्रतिक्रियाएं होती है, जिसे छुपा पाना कठिन होता है। मगर प्रेक्टिस के साथ इसपर कंट्रोल आ जाता है, आदमी कॉन्फिडेंस से झूठ बोलता है। इस स्किल की पहली शर्त है- उस झूठ को आप खुद पहले यकीन कीजिये। 

इस स्किल वाले व्यक्ति को अटेंशन डेफिसिट डिसऑर्डर भी हो, (जिसमे आदमी अपनी ओर सबका ध्यान बार बार खींचना चाहता है), तो लगातार झूठ बोलना, यकीन के साथ बोलना..  , मानसिक हालत बिगाड़ता जाता है। 

व्यक्ति उस झूठ के मिथ में पूरी सच्चाई के साथ जीने लगता है। एक के बाद एक झूठों की श्रृंखला, जिसमे इंसान झूठ का पूरा महाकाव्य रच लेता है मैथोमानिया है  

झूठे किस्सों का वेब, जिसमे वह खुद या तो हीरो हो, या विक्टिम- जिससे शान बढ़े या सिम्पथि मिले, मैथोमानिया के लक्षण है। आदमी ज्यादा से ज्यादा किस्से बताने बनाने में लगा रहता है। एक अलग ही दुनिया मे, डिनायल में, फैंटेसी में जीता है। अब ऐसे व्यक्ति को सत्ता और बेपनाह ताकत हासिल हो, तो कल्पना कीजिये क्या होगा। 

इर्दगिर्द सिर्फ उन चापलूसों की फौज होगी, जो इन किस्सों को सुनेंगे, ताली पीटेंगे, या सिसकियां भरेंगे..  ड्यूटीफुली!! 
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यह अवस्था डीप इंसिक्युरिटी, अवसाद या इन्फिरियरटी कम्प्लेक्स से उपजती है। ट्रामा या हेड इंज्युरी भी इसे प्रेरित कर सकती है। ड्रग या नशे के एडिक्ट भी इस मैथोमानिया से पीड़ित होते हैं । आत्मदया के साथ बेहद क्रूर स्वभाव इसके परिणाम होते हैं। ऐसा व्यक्ति, भीरू होता है, मगर झटके में कोई भी इम्पलसिव डिसिजन ले सकता है। कोई भी ..   

अकारण झूठ बोलना आम तौर पर स्वस्थ मस्तिष्क में नही होता। ऐसे व्यक्ति, प्रथम बार मे मिलने पर विश्वास और नजदीकी का अहसास देते है। दिल खोलकर रख दिया अगले ने, ऐसा अहसास आपको बड़ी क्लोजनेस का यकीन देता है। की गई बातें, कोरी गप्प थी, ऐसा सोचने का आपके पास कोई कारण नही। 

मैथोमानिया के लक्षण इस तरह के हैं

1- अकारण, बिना लाभ, बिना किसी ऑकवर्ड सिचुएशन के झूठ बोलना
2- किस्से- लम्बे, डिटेल, वेल अर्टिकुलेटेड, रीजनिंग के साथ
3- किस्सों में वक्ता का हीरो, या विक्टिम होना। उसकी गलती कभी नही होगी। वह खुद ब्रेव और बेनोवेलेंट होगा। 
4- वो खुद फैक्ट और फिक्शन का अंतर भूल चुके होते हैं। उन किस्सों को वास्तविक मेमरी की तरह याद रखते हैं। मगर समय के साथ उन मेमरीज में इंप्रूवमेंट होता रहता है। उसी किस्से में बहादुरी या दुख का एक नया क्षेपक जुड़ जाएगा। एक ही स्टोरी के कई वर्जन होते है। 
5- ये नैचुरल परफॉर्मर होते है,, कन्विसिंग होते है। ये बरसों की प्रेक्टिस से उपजाई गयी स्किल है। ये एफर्टलेस होती है। 
6- प्रश्न किये जाने पर लम्बा उत्तर देंगे, जो कोई औऱ किस्सा हो सकता है। मगर मूल सवाल, कभी जवाब में नही एड्रेस होगा। 

राजनीति में मैथोमानिया  यह एक ईश्वरिय गिफ्ट हो सकता है। प्रशासक के लिए यह शाप है। प्रशासित जन के लिए, प्रशासित राज्य के लिए एक शाप है  

पर आत्माभिशापित जनता के लिए यह मनोरंजन का विषय हो सकता है।

Sunday, March 7, 2021

स्त्री दिवस

प्रेम में अक्सर समझदारी खो जाती हैं। खो जाते हैं पुराने चेहरे। एक दायरे में सिमट जाती हैं दुनियां। 
प्रेम में पड़ी स्त्री का संसार अलग हो जाता है।  भावनाओं के विशाल संसार में सोती- जागती   वो सपने बुनने लगती हैं, कल्पनाओं में प्रेमी को मुस्कुराते देखती हैं और बुदबुदा कर हवाओं के जरिए मौसम के नाव पर संदेश भेजती हैंं।
अपने प्रेमी को कभी हारते हुए नहीं देखना चाहती और उसे जिताने के लिए सबकुछ दाव पर लगा देती हैं। 
वह हवाओं के संग कभी तेज कभी मद्धम-मद्धम ऐसी जगह जाना चाहती हैं जहां उसके भावनाओं का विशाल साम्राज्य कायम रहे। बादलों का रंग बिरंगी पंख लगाएं दूर तक यात्राएं करना चाहती हैं यह जानने को- की उसका प्रेमी कितना दूर लेे जा सकता हैं। 
वह चिड़ियों की तरह होती हैं, जो उड़ना चाहती हैं। आज़ादी उसे पसंद होता हैं, और जो अपने प्रेमी को भी बदलो के पार ऊंचाइयों पर ले जाने को बेचैन होती हैं। 
कल्पनाओं में तिनके- तिनके जोड़ कर स्त्री अपने प्रेमी के साथ एक खूबसूरत महल बनाती हैं और जब प्रेमी के आंखो में अपने लिए प्रेम नहीं देखती तो हक्कीबक्की हो अंधेरों में खोने लगती हैं इस इंतज़ार के साथ की उसका प्रेमी आंखो में वहीं प्रेम लिए उसे ढूंढने आएगा।
लेकिन उसका प्रेमी, प्रेम रहित आंखो से झूठ बोलता हैं और वो टूट कर बिखर जाती हैं।
बिखेर देती हैं अपने ही हाथों से वो तिनका, कंकर- पत्थर जिससे अपने प्रेमी के लिए सपनों का महल बनाई हुई होती है। 
अब वो स्त्री एक नए रूप में सामने आती हैं जो अपने पर काट चुके प्रेमी को रुला कर खुश होती हैं और जमाने के लिए सख्त होती चली जाती हैं। 
स्त्री का सख्त हो जाना खतरनाक हैं और उसे सख्त बनाना अपराध। 



 

Wednesday, February 3, 2021

बची रहें मानवता

कायम रहें इमान बची रहें मानवता
 संबंधों की संवेदनशीलता
सब वैसे ही हो जैसे 
सुबह की ओस
 महुआ की महक
 पक्षियों की चहक
 भोर का उजाला
 सूरज भगवान की लालिमा
 गाय के बछड़े की पुकार
 ठंड, गर्मी बरसात, पतझड़
 और घर की ओर लौटते पशुओं की घंटी की आवाज़ 
बची रहे रात की नींद
 मधुर सपने 
सुबह का सुकून 
शाम की उदासी 
कायम रहे यह पहाड़
 झरने, जंगल, पेड़  नदियां और तालाब
नीचे पृथ्वी और ऊपर आसमान। 
और सब कुछ भुल जाने के बाद भी बची रहें वे  यादें! 
अविनाश पांडेय

Thursday, January 14, 2021

selflessness Timelessness Egolessness

शाम होने ही वाली हैं। पास ही में एक तालाब है, धूप-छाया के विस्तार में बड़ी सुखद घड़ियां बीत रही हैं। तालाब को हवा के तेज थपेड़ों ने  बेचैन कर रखा हैं। लहरें उठ रही, गिर रही और कुछ ढूंढती हैं। 
फिर हवायें सो गईं और तालाब भी सो गया।
मेरे अंदर से एक आवाज़ आई - जो बेचैन होता है वह शांत भी हो सकता है। बेचैनी अपने में शांति को छिपाये हुए है। तालाब अब शांत है। तब भी शांत था। लहरें ऊपर ही थीं, भीतर पहले भी शांति थी।’ 
हम भी ऊपर ही अशांत है। लहरें ऊपर ही हैं। भीतर गहराई में मौन है। विचारों की हवाओं से दूर जाते ही अंदर सब शांत हो जाता है, विचारों ने जो कचरा फैलाया था वो अब दिखने लगता है। 
अब चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई पड़ने लगी हैं, चिड़िया पहले भी चहचाहा रही थी लेकिन विचारों ने यूं उलझाया था कि आवाज़ पहुंच नहीं पा रही थी।
विचारों के विदा होते ही हवाएं कानों में अब कुछ कहना चाहती हैं, कुछ याद दिला रही अपनी संगीत से ... आंखे बरबस ही बंद होते जा रही है, होठ फैलने लगा हैं, सांस लयबद्ध हो सुकून दे रही है।  और आंखो से एक बूंद गालों पर लुढ़क चला हैं। समय का बोध मिट चला हैं और इसके मिटते ही समय के पार - सेल्फ्लेसनेस और ईगोलेसनेस किसी भी प्रकार की परेशानियों के अस्तित्व को नाकार रहा है।

दिन की शुरुआत

दिन की शुरुआत
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सुबह सो कर उठा तो बीती रात का आखिरी विचार जो नींद आने के पहले मन पर कब्ज़ा जमाए था, वो फिर से अपने अस्तित्व का याद दिलाया कि मै जिंदा हूं। 
विचार प्रेम का हो, विचार सकारात्मक हो तब तो अलसाया सुबह भी ऊर्जा से भर देता हैं। सूर्य भगवान मुस्कुराते नजर आते हैं, पूरा दिन कुछ ना कुछ पारितोषिक देते जाता हैं और शाम उस पारितोषिक का निचोड़ लिए, कई रंगबिरंगे रौशनियों को एक साथ जलाएं हूबहू उस नाइट क्लब की तरह सुकून देता हैं जिसमें रौशनियो का मतलब ही सुकून देने वाला अंधेरा  होता हैं। शाम अंधेरों में घिरती हैं, अंदर की बची हुई ऊर्जाएं भी  अपना रूप बदलते जोरदार भूख का आभास देते पाचन तंत्र के जिंदा होने का प्रमाण देती हैं। 
रात का आखिरी विचार... विचार जो कर्मो की नीव होते हैं, बिना विचार के कर्म संभव ही नहीं। पहले विचार ही अस्तित्व में आता हैं फिर वही विचार अपने अनुरूप कर्म करने को बाध्य करता हैं। 
कभी ऐसा भी था कि रात के आखिरी विचार दुश्चिंताओं से भरे डराने वाले होते थे। सेडक्टिव दवाओं के प्रभाव से जबरदस्ती का नींद तो आता था मगर रात भर वही विचारे अपना फन उठाएं सपनों के रूप में अंतरमन को जगाएं रखती थी। सुबह भी होता था... वैसा ही दिलकश- जैसा बचपन में छठ घाट पर महसूस होता था! मगर विचारों द्वारा समस्त ऊर्जा को चूस लिए जाने के कारण सुबह भी नीरस- उदासीन दिखती थी। सुबह- दोपहर- शाम - रात बिना ऊर्जाओं के जिए चले जाते हैं। रात का आखिरी विचार तरह- तरह का रूप बदलता, एक से हजार रूप में सामने आता हैं और फिर भ्रम पैदा करते वास्तविकता को ढंक लेता है। 
वास्तविकता के ओझल होते ही हर बात- व्यवहार में भ्रम का साम्राज्य कायम होता हैं। हर रोज - दिन यह प्रगाढ़ होते चला जाता हैं। हमारे होने की हर स्थिति हमे सहज लगती हैं - बीमार हैं तो बीमारी सहज लगने लगती हैं, स्वस्थ्य हैं तो स्वास्थ्य सहज लगता हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब कोई बीमार स्वस्थ्य होना शुरू होता हैं और उसे स्वास्थ्य असहज लगने लगता हैं। 
किसी भी चीज की चरम स्थिति या तो उब पैदा करती हैं या अपने रंग में रंग लेती हैं। 
 नकारात्मकता- दुश्चिंताओं- डर ने मेरे अंदर ऊब पैदा किया था और उसे परे कर जीवन को देखने का इशारा किया था। 
 सूत्र हाथ लग चुका था - रात का आखिरी विचार जैसा होगा वैसा ही दिन - रात - सप्ताह और महीना बीतता चला जाएगा। ऊब पैदा होने से हम चिजो को बदल डालने के लिए व्यग्र तो होते हैं, प्रोत्साहित भी होते है... मगर मन बने- बनाएं आरामदायक स्थिति से बाहर आना नहीं चाहता। आरामदायक स्थिति तोड़ने में काफी दर्द होता है,  जिसे मन के ऊपर जाकर लक्ष्य हासिल करना पड़ता हैं। 
हम क्या चाहते हैं यह हमें मोटिवेट करता हैं मगर उस लक्ष्य को पाना अनुशासन पर ही निर्भर करता हैं। अनुशासन यह की - हर रात का आखिरी विचार सकारात्मक होगा। मन- शरीर में रच- वस चुके नकारात्मक ऊर्जा को हर सुबह व्यायाम द्वारा फेफड़ों में ऑक्सीजन भर कर बाहर करेंगे। मेडिटेशन द्वारा अंतरमन को साफ रखेंगे। 
दीपावली की शुभकामनाएं

Sunday, January 10, 2021

खूबसूरत लोग

खूबसूरत लोग 
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 दुनिया का सबसे खूबसूरत जगह प्रकृति से दो- दो हाथ रोज करता हैं। हवाओं से बाते करता हैं। तूफानों से डिगता नहीं... पेड़ों को सुनता है। पत्तियों का आना और जाना देखता हैं। बर्फ की ठंडक के साथ करवटें बदलता वो जमीन सूर्य की किरणों से चमक जाता हैं। 
पेड़ यहां शिकायत नहीं करते। पक्षियों को किसी से जलन नहीं होता। जानवरों को राजनीति नहीं आती। जल... नदियां रुक कर आराम की नहीं सोंचते। पहाड़ का सीना कभी झुकता नहीं और घाटियां अपना रहस्य आसानी से किसी को बताती नहीं ... 
मै भी गुजरता हूं इन रास्तों से और मैंने भी पेड़ों को गाते सुना हैं। चिड़ियों की साज जैसे पहाड़ को मूर्तिवत कर देती है। 
हवाऐं पूछती है क्यों आए हो? जबाव में हवाओं को गले लगाना पड़ता है और हवाएं कई राज की बातें करती जहैं। 
इस दुनियां के सबसे खूबसूरत आदमी भी प्रकृति से दो-दो हाथ रोज करते हैं।
उन्होंने हार देखी है, निराशा के दलदल में डूबे- उतराए हैं, रोए हैं... चीखे हैं... चिल्लाए हैं, प्यार किए हैं और  अवसादग्रस्त हो फिर चुप से हो गए हैं। 
 अकेलापन को जीते वे असुरक्षा से थरथरा कर कांपे हैं, रहस्यमई रातों में तकिया गीला किया है और फिर एक दिन वे उठ खड़े हुए हैं। ज्यादा संवेदनशील हो दूसरों के भावनाओं का कद्र करना सीख जाते हैं।
ऐसे खूबसूरत लोग अब डरते नहीं और ना किसी को डराते हैं। जिन्दगी को समझते हैं, उसकी चाल से प्रश्न नहीं पूछते।
खूबसूरत लोग जन्म नहीं लेते हैं...! बन जाते हैं।