Saturday, June 17, 2023

सुबह की चाय मीठी होनी चाहिए।

सुबह की चाय मीठी होनी चाहिए। रात की कड़वाहट घुल जाती हैं। 
बेड टी की आदत महीनो पहले छूट चुकी थी। अब चाय की याद भी मुश्किल से आती थी। 
उन दिनों वह जहां रह रहा था वहां चाय की जगह उबले पानी में कुछ पहाड़ी जड़ी बूटियों को डाल एक शक्तिशाली पेय से दिन की शुरुआत होती थी।
 दुकान चलाने वाली महिला उसे दुकान में घुसते देख हंसती थी, शायद वह इस पेय को चाय समझ कर पीता था इसलिए। 
उसकी आवाज मुश्किल से उनलोगो ने सुना होगा और उन्हें ऐसा लगता था कि वह गूंगा हैं। इशारों इशारों में लेन– देन होता था।
एक सुबह नारियल के पेड़ वाली उस दुकान में घुसते ही हंसने और उसे लक्ष्य कर बोली गई बात सुनाई दी। 
यहाँ स्वर्गबाट ​​निर्वासित देवता आउनुहुन्छ। (लो आ गए स्वर्ग का कोई निर्वासित देवता) 
उनकी बातें सुन वह भी मुस्कुरा पड़ा था। वह थोड़ी बहुत यह भाषा समझता था,पर उन्हें लगता था कि उसे इसकी समझ नही।  शायद उसके लिए यह सबसे सटीक पहचान थी। 
एक खूबसूरत दिल जिसने कभी किसी को पीड़ा नही पहुचाई होगी, आज खुद पीड़े में था।
वक्त की साजिशे देख ऐसा लगता था कि सजा का ये सिलसिला कभी खत्म ही नही होगा। संभलने की कोशिसे करता और फिर से गिरा दिया जाता। 
कौन सोच सकता था कि एक हंसता बोलता लड़का यू खामोश हो जायेगा। सबकुछ बदल जायेगा और ऐसा बदलेगा की पहचान का कोई सिरा नजर नहीं आएगा। 
दोपहर की तरह निर्जीवता सुबह से ही उसके आस पास जमा हो जाती थी। 
कम आबादी वाले उन क्षेत्रों में हवाओं का शोर ही एक जाना पहचाना था। कुछ ऐसा था जिसे वह कस कर पकड़े रहता।  हवाओं को ले जाने नही देना चाहता था।  मगर वक्त के साथ चलने वाली ये हवा बलवान था। रोज कुछ ना कुछ छीन ही ले जाता और बदले में दुख सहने खातीर आंसू दे जाता था। 
खिड़की से दूर एक सुनसान रास्ता दिखाता था जो अक्सर तन्हाइयों से लिपटे मिलता था। वह रोज उस जगह जाने का सोचता। 
वह एक शाम थी और बुझती जा रही रौशनी में घुंघलका पसरा था। चुप्पी थी और चंद शक्ले आ जा रही थी। वह उस रास्ते पर बढ़ता जा रहा था। रास्ते की पहचान को लेकर कोई जिज्ञासा नही थी। 
वह सुबह होने तक उन रास्तों पर फिरता रहा था। ना रास्ते ने कुछ बोला ना उसने कुछ पूछा।  कई सवाल थे पूछने को मगर रास्ता उसके तरफ से उदासीन ही बना रहा। 
शायद रास्ता उससे ज्यादा अकेला था। उनकी राह ताकते ताकते जो इन्हीं रास्तों से होकर गुजरे मगर फिर वापस नही लौटे। 
जो वक्त के साथ बदलते नही उन्हें वक्त अकेला छोड़ आगे बढ़ जाता हैं। 
ये उदासी पुरानी हैं। 
घुटन, बेबसी, चोट, और खोते जाने के बाद ऐसी ही उदासी पसर जाती है। 
संवाद जैसे बर्फ की तरह जम जाते हैं। कैसे पिघलेंगे मालूम नही। अवचेतन की भाषा हमें करीब लाती हैं।  थोड़ी देर बाद हम उन्ही रास्तों पर बढ़ जाते है जो एक दूजे से दूर ले जाता है। उन दोनों के बीच  एक भाषा थी जो निर्जीव हो चुकी थी। 
राह किनारे कुछ पेड़ ठंड के ठिठुरन में बर्फ का चादर ओढ़े खड़े थे। सहमे से। 
 कई बातें  पेड़ से कहना–सुनना चाहता था अगर वे बोल सुन सकते तो। 
बचपन में सुना और पढ़ा था कि जिन पहाड़ों पर सबसे ज्यादा ठंड पड़ती है वह जगह प्रेतात्माओ का पसंदीदा जगह होता हैं। वे उधर रहते हैं।
उन दिनों डर भी नहीं लगता था। देर रात तक भटकता रहता था।
यह सुबह के ठीक पहले वाली घनी अंधेरी रात थी।  जब रास्ते भी चिड्डियो की आवाजे सुन जगने लगे थे। 
 भीतर का अंधेरा और बाहर पसरी अंधेरा मिलकर एक रौशनी का निर्माण कर रहे थे। 
शायद कल का आसमान सूरज से सुसज्जित होगा। धूप खिलेगा। 
यह विदा हो रहा मौसम, रोज अपना कुछ निशान छोड़ता जा रहा था। शायद यह हमेशा के लिए मेरे से दूर जा रहा था।

वह रेगिस्तान था रेगिस्तान ही रहा

वह रेगिस्तान था रेगिस्तान ही रहा। लोग आते रहे, कदमों के निशान बनते रहे और आंधियां निशान मिटाती रही। 
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वह एक पहाड़ी लड़का था तो पहाड़ी लोककथा और लोकगीत सुनते हुए बड़ा हुआ था। सपने भी उसे हरा–भरा और रोमांच वाले ही आते थे। 
लेकिन अक्ल का दांत टूटते ही उसके सपने, दुस्वप्न में बदल चुके थे। सपनों का ऐसा डर की रात में सोने से डर लगे। नींद की गोलियों के असर से सपने रात भर के लिए सप्रेस्ड तो हो जाते थे लेकिन होश आने पर, दिन की रौशनी में उसकी काली परछाई चारों तरफ से घेरे  रहती। 
वर्षो बाद उसे फिर से वही दुस्वप्न दिखने लगे थे।
उसे ताज्जुब हो रहा था कि उसका जीना नया हैं, कर्म नया हैं और कर्म का कोई अतीत भी नही होता, फिर भी वर्षो बाद वही दुस्वप्न आ रहे हैं।  
वह एक पहाड़ की आसान सी चढ़ाई पर चढ़ रहा हैं। यह सूर्यास्त से ठीक पहले का समय है। पहाड़ की चोटी गाढ़ी रौशनी से नहाई हुई हैं। यह रौशनी डरावनी रूप में उसकी तरफ बढ़ रही है। पहाड़ की तलहटी में पानी की ठहरी हुई एक झील हैं, जो अस्त हो रहे सूरज के रंगों से झिलमिला रहीं हैं। अचानक अंधेरा हो जाता हैं। पहाड़ जीवन सा धड़कने लगता हैं। उसके नीचे की जमीन सागर की लहरों की तरह उछल रही हैं।  पैर उखड़ने लगते हैं। वह एक ऐसी झील में गिर रहा हैं  जिसका पानी काला हैं। फिर कुछ बचता नही सिवाय काली अंधेरों के सिवा। 
पहली बार जब ये दुस्वप्न दिखने शुरू हुए थे तो किसी ने सलाह दी थी कि पहाड़ की जगह रेगिस्तान की कल्पना किया करो। सपने आने बंद हो जाएंगे।
कल्पना के लिए वो रेगिस्तान की यात्रा पर था।
 पहाड़ पर पाला बढ़ा उसके अनुभव में सिर्फ हरियाली – फूलों की खुशबू और चिड़ियों की चहक थी। 
लेकिन रेगिस्तान को देख उसे पहली बार अनुभव हुआ की बिना चिड़ियों का आकाश कितना सुना लगता हैं। बिना चिड़ियों का आकाश नही होना चाहिए। 
विशाल खालीपन समेटे यह रेगिस्तान खुद अपने ताप में रोज झुलसता था। सैलानी आते थे, चहलकदमी करते थे, कदमों के निशान बनाते थे, रेत पर लेट कर पिक्चर लेते थे फिर खुद पर चिपक आए रेत को झाड़ चल देते थे। सैलानियों से भरे होने के वावजूद भी रेगिस्तान का अकेलापन स्थाई था। अकेलापन अकेले जीना पड़ता हैं कोई चाह कर भी बांट नही सकता। 
" क्या तुम्हे बुरा नही लगता"– उस लड़के ने रेत पर लेटे रेत से सवाल किया था।
जवाब में रेत ठहरी नजरो से देखा भर था। सुखी और कठोर आंखों में एक शैतानी चमक थी जो किसी को भी डरा सकता था।  
लड़के के अंदर और सवाल करने की हिम्मत नही बची थी।
रेत में सर टिकाए लड़का सोच रहा था – जिससे एक–एक कर  सब छीना जा रहा हो– उसका ‘मैं’, सुंदरता, मुस्कुराहट, पानी, हरियाली और गौरवपूर्ण अतीत– उस मरे हुए रूह में शैतान का घर होता हैं। उसका सख्त और क्रूर होना लाज़िमी हैं।
साल में एकाध बार रेगिस्तान विशाल महलों वाले गौरवपूर्ण अतीत को याद कर आंसू जरूर बहाता था। लेकिन हर आंसू उसे और मायावी और क्रूर बनाते थे। 
किसी भटक गए राहगीर को गलत रास्ता दिखाता। प्यासे को दूर सामने चमकीला झील होने का भ्रम देता और प्यासे के वहा पहुंचते ही रेत शैतानी ठहाके लगा, प्यासे को गोल गोल तब तक घुमाता जब तक प्यास से उसकी मृत्यु न हो जाती। 
कहावतों में प्रचलित था कि रेगिस्तान पर कभी भरोसा नहीं करना। यह मायावी और कठोर होता हैं।  इसे जादू टोना आता है। 
लेकिन क्या हमेशा से रेगिस्तान ऐसा ही था? हरगिज नही! गहरा समुंद्र हुआ करता था। लोग अपने फायदे के लिए समुंद्र को रेगिस्तान बना डाले और अब रेत से खेलने आते हैं। 
वह पहाड़ी लड़का अब शांत था। 
रात घिर आई थी। रेगिस्तान उस पहाड़ी लड़के के प्रति थोड़ा शीतल हो चला था। उसे अपना रहा था। कई रातों का जगा वह नींद के आगोश में था। 
 सपने फिर भी आए थे – सामने रेगिस्तान था , तुफानों के बवंडर में नाचता लड़के को भी अपने में समेट रहा था। दम घुटने लगे थे। उसे प्यास लगी थी। प्यास की महीन डोर गले को कस रही थी।  पानी की खोज में वो लड़का रेगिस्तान के अंदर तक घंसता जा रहा था। 
@अविनाश पाण्डेय