Tuesday, September 23, 2025

डायरी

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│ 24 जनवरी 2016 │
│ अविनाश पाण्डेय │
│ │
│ आज मैंने एक बात बड़े जोर से महसूस की — │
│ ज़िंदगी में स्पष्ट होना कितना जरूरी है। │
│ │
│ निर्णय लेना आसान नहीं होता हैं। │
│ कई बार उसकी कीमत चुकानी पड़ती है — │
│ रिश्ते टूट जाते हैं, मौके निकल जाते हैं, लोग आपको गलत समझते हैं।      
  
│ लेकिन जब भीतर का शोर थमता है, │
│ तब महसूस होता है — यही सही था। │
│ │
│ स्पष्ट मन से लिए गए फैसले │
│ हमेशा सुकून देते हैं। │
│ और यही सुकून भरा मन │
│ सही सोच और सही परिणाम देता है। │
│ │
│ फाइनेंस ने भी एक सबक सिखाया — │
│ पैसा चाहे जैसा हो– जिसका हो, पैसे का स्वभाव है, खर्च होना।                          
│                                                  
│                                                                            
│ सबसे बड़ा सबक — │
│ उधार मत लो │
│ जब तक हालात जान लेने की नौबत न बना दे। │
│ उधार की ज़िंदगी का कंपाउंडिंग तेज़ होता है │
│ और decay भी उतना ही तेज़। │
│ एक बार इस जाल में फँस गए, │
│ निकालना आसान नहीं। │
│ │
│ आज के लिए बस इतना ही– │
│ उमड़ते घुमड़ते विचारों को बाहर फेंक │
│ अब सोते हैं हिप्टोनाइज़ के साथ। │
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सड़क और यादें

अविनाश पाण्डेय

सड़क और यादें
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कभी एक सड़क थी,
धूल भरी, धूप में झुलसती,
और हर कदम पर छोटे-छोटे कदमों की गूँज भर देती।
उस सड़क के किनारे एक इकलौता पेड़ खड़ा रहता,
उसकी छाया में हम घंटों बैठा करते।
उसके पास एक आम का पेड़ भी था,
जो हमेशा ताड़ की ऊँचाई को चुनौती देता।
मैं अक्सर कहता —
“अगर इसे सीधा कर दिया जाए, ताड़ से बड़ा हो जाएगा।”

कभी दोपहरी, कभी शाम,
रोज़ एक लड़की लंगड़ाकर उस रास्ते से आती-जाती।
आँखों में खामोशी,
नजर जमीन पर,
और मन में पैर की कसक।
मेरा दोस्त सहानुभूति से लेकिन
पूर्ण विश्वास के साथ कहता —
“अगर मेरा वस चले, मैं उससे शादी करू।”
मेरे लिए उसकी यह बात सुनना,
किसी अजूबे से कम नहीं था।

समय ने सब बदल दिया।
सड़क अब चमचमाती है,
पेड़ गायब हैं,
लड़की कहीं और है,
और दोस्त शायद भूल चुका है कि उसने यह कहा था।
मैं आज भी जब कभी आम और ताड़ का पेड़ एक साथ देखता हूँ,
मन ही मन मापना शुरू कर देता हूँ —
आम या ताड़, कौन बड़ा?

कभी-कभी, धुंधली याद में,
मुझे लगता है कि वह सड़क फिर से धूल भरी है,
पेड़ झूमते हैं,
लड़की गुजरती है,
और दोस्त दुनिया को दिखाना चाहता है कि
वो लड़की बाहर से लंगड़ी है,
पर अंदर से बेहद खूबसूरत।

लेकिन यह केवल झलक है।
तमाम कहानियां समय के साथ ऐसे गुम हो जाती हैं जैसे कभी थी ही नहीं।

#लाइफ #यादें #लम्हा #लेखक

Sunday, September 14, 2025

जिन्दगी गोल गोल है

ज़िंदगी गोल-गोल है, जैसे पहिया—कल सच था, आज झूठ। प्रकृति अपने चक्र में हमें लगातार चौंकाती है। सोचिए, एवरेस्ट की चोटी की कठोर चट्टान और करोड़ों साल पहले समुद्र की गहराई में डूबी चट्टान—एक ही हैं।

सनातनी संत, महात्मा शंकराचार्य और उनके अनुयायी, इस पर कभी आश्चर्यचकित नहीं हुए। उत्तर उनके पास हमेशा मौजूद था—कल्प की शुरुआत में पृथ्वी सागर में डूबी थी। विष्णु का वाराह अवतार उसे उठाकर सृष्टि की नींव रखता है। यह कथा पद्मपुराण में विस्तार से वर्णित है।

वेद, उपनिषद, पुराण—सैंकड़ों हमले झेले, झूठा कहा गया, लेकिन संत मुस्कुराते रहे, दृष्टा बने रहे। आज वही विज्ञान, अपनी सीमित तर्क शक्ति में अहंकार में डूबा, उन्हीं पत्थरों को प्रमाणित कर रहा है।

और आज, गहराई और रहस्यों से भरी सनातन परंपरा को हिंदू धर्म के नाम पर दबाया जा रहा है। कुछ मुट्ठी भर राजनीतिक पाखंडियों के उकसावे पर, हम वही सनातनी हैं—जो धर्म का अध्ययन किए बिना उसका झंडा उठाकर ढोंग करते हैं।

याद रखिए—हम धर्म को नहीं बचाते; धर्म हमें बचाता है। धर्म अपनी रक्षा खुद करता है।

—अविनाश पाण्डेय

Monday, September 8, 2025

चुप्पी और दूरी के बीच

जीवन में बहुत-सी बातें समझ से परे होती हैं।
जैसे—क्या पहाड़ कठोर है, इसलिए नदियाँ उसे छोड़ गईं?
या नदियाँ छोड़ गईं, इसलिए पहाड़ कठोर हो गया?

जीवन की कुछ सच्चाइयाँ हमेशा धुंध में छिपी रहती हैं।
हम उन्हें पकड़ना चाहते हैं,
पर वे हमारी उंगलियों से फिसल जाती हैं।

क्या पहाड़ का कठोर होना नदियों का दोष था,
या नदियों का जाना उसकी नियति?
ठीक वैसे ही जैसे रिश्तों में—
कभी समझना मुश्किल होता है
कि चुप्पी ने दूरी बनाई,
या दूरी ने चुप्पी को जन्म दिया।

–– अविनाश पाण्डेय

Friday, September 5, 2025

टूटना बिखरना और फिर मुस्कुरा देना


मनुष्य के लिए कोई पीड़ा शाश्वत नहीं।
समय उसे काटता-तराशता है,
जब तक कि दिल थककर उसे स्वीकार न कर ले।

आँसू बहते हैं, फिर सूख जाते हैं।
तन्हाई बोझ नहीं रहती,
एक अनिवार्य साथी बन जाती है।

जिन लोगों को खोया है,
वे स्मृतियों में बदल जाते हैं।
घाव भरते हैं,
और टूटी उम्मीदें धीरे-धीरे
अपनी चुभन खो देती हैं।

— अविनाश पाण्डेय