Wednesday, March 26, 2025

बस यू ही

बस यूँ ही...

कभी-कभी ज़िंदगी चलती रहती है — बिना किसी वजह, बिना किसी मंज़िल के... बस यूँ ही।

हम सवाल करते हैं, जवाब तलाशते हैं, मगर कुछ सवालों का कोई जवाब नहीं होता। वो हवा में तैरते रहते हैं, जैसे अधूरे ख़्वाब। हम हर रोज़ वही रास्ते दोहराते हैं, वही चेहरे, वही रूटीन — और दिल के किसी कोने से एक आवाज गूंजती रहती हैं, "आखिर ये सब क्यों?"

पर ज़िंदगी कोई सफाई नहीं देती। वो बस कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाती है।

कभी खुशी मिलती है, तो हम पूछते हैं, "मैंने ऐसा क्या किया जो ये नसीब हुआ?"
और जब दर्द मिलता है, तो सवाल और गहरा हो जाता है, "मैंने क्या गुनाह किया था?"

मगर ज़िंदगी हर बार चुप रहती है — जैसे कह रही हो, "सब कुछ इसलिए नहीं होता कि उसकी कोई वजह हो… कुछ चीज़ें बस यूँ ही हो जाती हैं।"

कभी लोग साथ छोड़ जाते हैं — बिना अलविदा कहे, बिना वजह बताए।
कभी हम खुद लोगों से दूर हो जाते हैं — बिना किसी ठोस कारण के, बस दिल थक जाता है।
कभी कोई सपना अधूरा रह जाता है, और हम आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं — पर उस अधूरेपन की गूंज भीतर कहीं रह जाती है।

शायद यही ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच है — हर चीज़ की वजह जरूरी नहीं होती।
कुछ रिश्ते, कुछ रास्ते, कुछ फैसले, और कुछ अधूरी कहानियाँ… ये सब बस यूँ ही होते हैं।

और शायद हमें हर बार वजह ढूंढनी भी नहीं चाहिए।
कभी-कभी जीना भी तो… बस यूँ ही अच्छा लगता है।

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वजह बेवजह होती हैं

वजहें बेवजह होती हैं...

कभी-कभी हम ज़िंदगी में किसी चीज़ के पीछे भागते हैं — एक मुकाम, एक इंसान, एक ख्वाब — ये सोचकर कि जब वो मिल जाएगा, तो सब ठीक हो जाएगा। मगर जब वो मिल भी जाता है, तो दिल के खाली कोने वैसे के वैसे रह जाते हैं। तब एहसास होता है कि शायद हम जिसे वजह मानकर जी रहे थे, वो खुद एक बेवजह तलाश थी।

इश्क़ में भी ऐसा ही होता है — हम किसी से मोहब्बत कर बैठते हैं, बिना ये सोचे कि क्यों। जब कोई पूछता है, "तुम उसे इतना चाहते क्यों हो?" तो हमारे पास कोई ठोस जवाब नहीं होता। सच तो ये है कि मोहब्बत की सबसे बड़ी वजह यही है कि उसकी कोई वजह नहीं होती।

कभी-कभी हम किसी से नाराज हो जाते हैं, रूठ जाते हैं, यहां तक कि उनसे दूर चले जाते हैं। मगर जब खुद से पूछते हैं कि असल ग़लती क्या थी, तो जवाब धुंधला सा लगता है। शायद दर्द की सबसे बड़ी सच्चाई यही है — वो बिना वजह भी जिंदा रहता है।

और कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है, जहां हम हार मान लेते हैं, बिना जाने कि हार किससे हो रही है। हम थक जाते हैं, बिना जाने कि किससे लड़ रहे हैं। शायद, ये लड़ाई भी बेवजह होती है — जैसे जीना कभी-कभी बेवजह हो जाता है।

पर शायद ज़िंदगी का असली जादू भी इसी में छिपा है — जब वजहें खत्म हो जाती हैं, तब असली जीना शुरू होता है। जब हम सवाल पूछना छोड़ देते हैं, तब जवाब खुद आने लगते हैं।

क्योंकि कुछ एहसास, कुछ रिश्ते, और कुछ सफर... वजहों के मोहताज नहीं होते।
वो बस होते हैं — बेवजह।