Sunday, April 20, 2025

वो जगह अब खाली नहीं


---

हमारी आख़िरी मुलाक़ात कभी नहीं हुई।
और शायद हो भी नहीं सकती थी।

हम बस मिलते रहे—जैसे दो लोग जो जान चुके हैं कि बात अब आगे नहीं जाएगी,
फिर भी बोलते हैं,
जैसे कोई दास्तान जो रुकने से पहले अपना एक वाक्य पूरा करना चाहती है।

वो हर बार नज़रें चुरा लेती,
और मैं हर बार यही चाहता कि वो देखे—एक बार।
मुझे नहीं,
मेरे भीतर जो बाक़ी था उसे।

मुझे ग़ुस्सा आता था,
बहुत।
जैसे कोई ताले में हाथ मार रहा हो
जिसकी चाबी किसी और की जेब में चली गई हो।

बाद में समझ आया—
उसने नज़रें चुराईं नहीं थीं,
वो बस कहीं और देखने लगी थी।

शायद अब उसकी शामों में
कोई और कॉफ़ी मंगवाता होगा।
किसी और की बातों पर वो उसी तरह सिर झुकाकर हँसती होगी,
जैसे कभी मेरे शब्दों की छाँव में हँसी थी।

मैं जानता हूँ,
उसने कभी मुँह फेरकर मुझे छोड़ा नहीं।
वो तो बस धीरे-धीरे
किसी और के साथ रहने लगी थी—
उसी ख़ामोशी में,
जिसमें हम दोनों एक वक़्त में
एक-दूसरे से दूर होने लगे थे।

हमारी आख़िरी मुलाक़ात नहीं हुई—
पर जो नहीं हुआ,
वही सबसे सच था।
क्योंकि कुछ रिश्ते
एक दरवाज़ा नहीं,
एक खिड़की बनकर छूट जाते हैं—
जिससे हम देखते हैं,
कि वहाँ अब कोई और बैठा है
जहाँ एक वक़्त में
हम थे।

Saturday, April 19, 2025

उस आखिरी बूंद तक

" उस आखिरी बूंद तक"
–––––––––––––

‘Ex बार’ वो जगह थी जहाँ हम अक्सर मिलते थे —
कम रोशनी, धीमा संगीत, और शराब की गंध में डूबी कुछ अधूरी कहानियाँ।

मैं और वह आमने-सामने बैठते, लेकिन हमारे बीच जो सबसे गहरी चीज़ होती — वो कभी मेज़ पर नहीं रखी जाती।
वह वाइन धीरे-धीरे पीती थी, जैसे हर घूंट में कोई भूली हुई याद घुल रही हो।
मैं जैकब्स क्रीक में अपनी चुप्पी डुबोता रहता —
क्योंकि कुछ बातें सिर्फ़ जलती हैं, कही नहीं जातीं।

"कभी सोचा है, अगर हम पहले मिलते?" उसने पूछा, लेकिन उसकी आँखें कहीं और थीं।
"शायद तब भी कुछ छूट जाता," मैंने कहा।
क्योंकि आरज़ू वक़्त की मोहताज नहीं होती,
वो तो बस छूट जाने के लिए पैदा होती है।

उसने हँसते हुए सिर झटक दिया —
वो हँसी नहीं थी, वो थक कर हथियार डाल देने जैसा कुछ था।

बार की खिड़की के बाहर बारिश गिर रही थी —
हम दोनों जानते थे, हम बच सकते थे,
लेकिन भीगना ज़्यादा सच्चा लग रहा था।

वो उठी, और जाते-जाते अपनी खाली ग्लास को एक तरफ सरका दिया —
जैसे कोई अधूरी बात, जो फिर कभी नहीं पूछी जाएगी।
मैं वहीं बैठा रहा — उस गिलास में ठहरी आख़िरी बूँद के साथ,
जिसमें उसका जाना अब भी थोड़ा बाक़ी था।

रेगिस्तानी शाम

"चुप्पियों वाली वो रेगिस्तानी शाम "
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वो कोई ख़ास दिन नहीं था।
न कोई मौसम बदला था,
न कोई रिश्ता टूटा था।
फिर भी शाम अजीब थी —
जैसे कुछ सूख गया हो भीतर।

वो शाम किसी दिन की थकान भी नहीं थी,
वो एक उम्र की चुप्पी थी
जो धीरे-धीरे आकर
रेत की तरह सब पर फैल गई थी।

आसमान कुछ नहीं कह रहा था,
फिर भी उसमें कुछ टूट रहा था —
शायद उजाला।

उसकी नीरवता इतनी सघन थी
कि अगर किसी ने साँस भी ली होती,
तो वो भी एक अपराध लगती।

चुप्पियों वाली वो एक रेगिस्तानी शाम थी।

रेगिस्तान में शामें अचानक नहीं आतीं —
वो रेंगती हैं,
जैसे कोई पुरानी याद
धीरे-धीरे दिल पर चढ़ती जाती है।

और जब तक तुम्हें एहसास हो,
तुम उस चुप्पी के बीच अवाक पाए जाते हो,
जहाँ खुद से आँख मिलाने की हिम्मत भी नहीं होती।

इस चुप्पी में कोई संवाद नहीं होता —
फिर भी हर चीज़ बोल रही होती है।

एक टूटे हुए वक़्त की सरगोशियाँ,
एक अधूरे आदमी की साँसें,
एक खोई हुई उम्मीद की गंध...
सब कुछ हवा में है,
पर कुछ भी थामा नहीं जा सकता।

वो अपने साथ एक बोझ लाती है,
जो न कांधे पर रखा जा सकता है,
न किसी से बाँटा जा सकता है।

कभी-कभी ऐसा होता है —
कि वक़्त, जगह और मन —
सब मिलकर एक खालीपन रचते हैं।

ऐसा खालीपन जिसे न भरा जा सकता है,
न भुलाया।

—— Avinash Pandey 

Wednesday, April 9, 2025

"अतीत की परछाइयां"

"जहां मैं हूं"






 "जहाँ मैं हूँ"

शुरुआत कहाँ हुई, ये मालूम था।
एक रोशनी थी, एक रोशनी में आँख खुली।
और अंत?
वो भी साफ़ है। एक दिन सब बंद हो जाएगा।
साँसें, आवाज़ें, ख्वाब—सब।
इसमें कुछ नया नहीं है।
जो चीज़ हमेशा अनजानी रही,
वो था ये बीच का हिस्सा।

यही हिस्सा सबसे मुश्किल था और सबसे सच्चा भी।
इसी में मैंने खुद को खोया, और फिर पाया।
बहुत कुछ चाहा था एक वक़्त में।
भागा, टूटा, लड़ा, हँसा भी…
पर जितना ज़्यादा चीज़ों का पीछा किया,
उतना ही खुद से दूर होता गया था।

 एक दिन बेचैन शहर के एक शांत दुपहरिया में अचानक से एक समझ हवाओं के साथ अंदर प्रवेश किया था —जिस चीज़ का पीछा करोगे,
उसके आख़िरी सिरे पर तुम ही खड़े मिलोगे।
वक़्त की रफ़्तार में घूमते-घूमते
आदमी आखिर खुद के ही पास लौट आता है।
बचने की कोई जगह नहीं है।

जो मेरा हिस्सा हैं, वो मुझे समझेगा। वो मुझे ढूंढने की कवायद नहीं करेगा।
समझ और खोज पर्यायवाची होते है। 
वो शोर में नहीं ढूंढेगा मुझे। किसी ढलती धूप में मेरी चुप्पी पढ़ेगा।
वो जानता होगा कि मैं वहीं हूँ—किसी पुराने गीत की तरह...किसी शाम के सन्नाटे में,
या एक कप चाय के पहले घूँट में।

ज़िंदगी कोई रिहर्सल नहीं है।
कोई "कट" नहीं मिलेगा।
जो किया, वो दर्ज़ हो गया।
जो जिया, वो अब इतिहास है।
और चाहकर भी उसे मिटा नहीं सकते।
बस समझ सकते हैं।
और आगे कुछ बेहतर जी सकते हैं।

और इस बीच के पन्नो में लिखी कहानी!
प्यार?
वो पहली बार नहीं होता।
पहली बार तो एक हल्की सी चिंगारी होती है—अधूरी, घबराई हुई।
असल प्यार तब होता है, जब तुम सबकुछ देख चुके होते हो,
और फिर भी रुकते हो।
आख़िरी बार प्यार करना—मतलब किसी के पास टिक जाना।
बिना शर्त, बिना शक,
बिना डर के।
शुरुआत और अंत किताब के कवर हैं।
पर असली कहानी, असली गहराई,
वो तो बीच में है—वहीं जहाँ मैं हूँ।
सचमुच का मैं।


Tuesday, April 8, 2025

सच और भ्रम

एकांकी: सच और भ्रम

पात्र:

1. मनुष्य – असमंजस में पड़ा हुआ।


2. सत्य – स्थिर, गंभीर, अडिग।


3. भ्रम – चंचल, आकर्षक, छलपूर्ण।



(मंच पर अंधेरा। धीरे-धीरे हल्की रोशनी होती है। मनुष्य बीच में खड़ा है, उलझन में। सत्य और भ्रम उसके सामने हैं—एक शांत, दूसरा मोहक।)

भ्रम (मुस्कुराकर): जीवन आसान है, बस बह जाओ! जो अच्छा लगे, वही सही है। कोई बोझ, कोई सवाल नहीं।

सत्य (दृढ़ स्वर में): आसान रास्ता हमेशा सही नहीं होता। जो चमकता है, वह सच नहीं होता।

मनुष्य (घबराया हुआ): लेकिन सत्य कठिन है, पीड़ादायक भी!

भ्रम (हंसकर): और मैं? मैं सुखद हूँ, मनमोहक भी! बस आँख मूंदो और आनंद लो।

सत्य (कड़क स्वर में): आँखें खोलो! भ्रम पलभर का सुख देता है, लेकिन गिरावट भी उसी से शुरू होती है।

(मनुष्य भ्रम की ओर बढ़ता है, लेकिन ठिठक जाता है। एक क्षण रुकता है, फिर सत्य की ओर मुड़ता है। भ्रम फीका पड़ता है, मंच पर प्रकाश फैलता है।)

मनुष्य (निर्णयात्मक स्वर में): सत्य कठिन सही, पर स्थायी है। मैं भ्रम से मुक्त हूँ!

(पर्दा गिरता है।)

रेगिस्तान की प्रेमिका


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रेगिस्तान की प्रेमिका

कभी मैं जल नहीं था।
मैं भी धरती था—मटियाला, कोमल, छाया से भरा हुआ।
और वो… वो मेरी देह पर चलती थी नंगे पाँव।
उसके पैरों की छापें मिटती नहीं थीं।
वो चलती थी तो रुक जाती थी हवा, और समय भी।

उसकी हँसी में बारिश की गंध थी।
उसके हाथों में बीज थे—प्रेम के, प्रतीक्षा के।
वो बोती थी सपने, मैं उगाता था सावन।
तब मैं रेगिस्तान नहीं था।
मैं उसके भीतर का हरा भूगोल था,
उसकी आँखों से बहता हुआ।

वो कहती थी—"एक दिन सब रेत हो जाएगा।
तू भी, मैं भी।
और हमारी स्मृति भी इतनी हल्की हो जाएगी कि उड़ जाएगी इस हवा में।"
मैं हँसता था,
क्योंकि मैं नहीं जानता था वक़्त की भूख।

फिर एक दिन वो गई।
ना युद्ध हुआ, ना विद्रोह।
बस ख़ामोशी थी, और उसका जाना।

और उसके बाद, धीरे-धीरे सब सूखता गया।
पहले मेरा पानी, फिर रंग, फिर आवाज़।
मैंने उसकी छाँव के बिना जीना सीखा,
और फिर मैंने जीना छोड़ दिया।

तब से मैं रेगिस्तान हूँ।
विस्तृत।
ख़ामोश।
अकेला।

अब वो लौटे भी,
तो मुझे पहचान न पाए।
अब मैं उसकी स्मृति नहीं, उसका शाप हूँ।
हर वो जगह जहाँ वो हँसी थी,
अब वहाँ गर्म रेत है।

पर जब रात आती है,
और चाँद मेरी उजड़ी छाती पर उतरता है—
कभी-कभी उसका चेहरा दिखता है मुझे।
हवा में उसकी हँसी तैरती है।
मैं छूना चाहता हूँ,
पर मैं जानता हूँ—रेत को कभी आग़ोश नहीं मिलती।

बस बिखराव होता है।
और इंतज़ार।


---



मेरी तीन कविताएं

"मेरी तीन साहित्यिक रचनाएं"
                 
 1

।।समय के खुरदरे काग़ज़ पर।।

किसी ने एक रेखा खींची थी
शब्द नहीं थे,
लेकिन अर्थ भारी थे — जैसे पुराने जूतों में भरी हुई यात्रा

काँपती लौ ने कहा —
मैं बुझूँगी नहीं
जब तक भीतर की अंधेरी बात
ख़ुद को कह न ले

हर दीवार पर
कोई पुराना धब्बा है
जो कहता है —
यहाँ कभी कोई रोया था, चुपचाप

पेड़ हवा से पूछता है —
क्या गिरना ही मेरा उत्तर है?
हवा कहती है —
गिरते हुए ही बीज बनता है

कुछ सन्नाटे
बहुत दूर से आते हैं
जैसे किसी पुराने संवाद की
अबूझ गूँज

और हम —
अपनी ही परछाई में
हर रोज़ कुछ खोते हैं
जैसे प्यास, पानी के पास होकर भी
कम हो जाती है

तो अब
अपने भीतर उतरना सीखो
जैसे जल में जल उतरता है
बिना आवाज़, बिना नाम

और जब लौटो —
तो अपने साथ
थोड़ी ख़ामोशी लेकर लौटो
ताकि दुनिया को
कभी खुद से सुनने की आदत पड़ जाए।
    
 अविनाश पाण्डेय 

---
2

|| यादों की कोठरी ||

एक पुरानी कोठरी है
दिमाग़ के सबसे पीछे
जहाँ धूल नहीं जमती
सिर्फ़ साँसें ठहरी रहती हैं

वहीं पड़ी है
वो हँसी जो अधूरी रह गई थी
एक गिलास — आधा पानी, आधा इंतज़ार
और एक पत्र — जिसमें नाम मिट चुका है

यादें चीज़ें नहीं होतीं
वे हवा की तह में छुपी
एक पुरानी गंध होती हैं
या चाय के कप में बचा
वो आख़िरी घूँट, जो कोई पी नहीं पाया

कुछ शामें लौट आती हैं
किसी पुराने गाने की तरह
जिसे सुने तो थे
मगर समझा बहुत बाद में

एक खिड़की थी उस घर में —
खुलती थी पश्चिम की ओर
अब वो घर नहीं रहा
पर वो दिशा अब भी भीतर खुलती है

यादों को सहेजना
जैसे धूप को हथेली में भरना
वो जलती नहीं
पर थोड़ी देर तक
हमारे भीतर सब कुछ रोशन कर जाती है

और जब हम थक जाते हैं
तो वही कोठरी
एक चुप्पी बनकर
हमारे सिरहाने बैठ जाती है
जैसे कोई पुराना दोस्त
कुछ न कहकर भी
सब कह देता है।

--- अविनाश पाण्डेय

3

|| पत्थर बोला पानी से ||

पत्थर बोला पानी से —
मैं स्थिर हूँ, तू क्यों बहता है?
पानी हँस पड़ा —
तू भीतर का कंपन नहीं जानता

टहनियाँ झुक रही हैं
लेकिन जड़ें गीत गा रही हैं
हर झुकाव के नीचे
एक इनकार की गूँज होती है

दिशाएँ भी कभी-कभी थक जाती हैं
और हवाओं से पूछती हैं —
क्या लौटना भी एक यात्रा है?
या सिर्फ़ एक और भूल?

एक आँख, दूसरी आँख में
रात भर उजाला उगाती है
नींद कोई समाधान नहीं —
वो तो बस एक और प्रश्न की देहरी है

छायाएँ अब बात नहीं करतीं
वे बस दीवारों पर
अपने पुराने प्रश्न चिपकाती हैं
जैसे कोई भूला हुआ वादा

कभी-कभी,
कंधों पर रखा हाथ
पूरी पृथ्वी जैसा भारी होता है
और मुस्कान —
केवल एक सूती पर्दा, भीगे हुए दुःख पर

इसलिए,
चुप रहो —
जैसे मिट्टी चुप रहती है बीज के इंतज़ार में
जैसे कल चुप रहता है
आज की साँसों में

और जब बोलो —
तो अपने भीतर के मौसम से बोलो
ताकि आवाज़ में
कोई दिशा काँप उठे।

अविनाश पाण्डेय 
––––––––


जहां मैं हूं






 "जहाँ मैं हूँ"

शुरुआत कहाँ हुई, ये मालूम था।
एक रोशनी थी, एक रोशनी में आँख खुली।
और अंत?
वो भी साफ़ है। एक दिन सब बंद हो जाएगा।
साँसें, आवाज़ें, ख्वाब—सब।
इसमें कुछ नया नहीं है।
जो चीज़ हमेशा अनजानी रही,
वो था ये बीच का हिस्सा।

यही हिस्सा सबसे मुश्किल था और सबसे सच्चा भी।
इसी में मैंने खुद को खोया, और फिर पाया।
बहुत कुछ चाहा था एक वक़्त में।
भागा, टूटा, लड़ा, हँसा भी…
पर जितना ज़्यादा चीज़ों का पीछा किया,
उतना ही खुद से दूर होता गया था।

 एक दिन बेचैन शहर के एक शांत दुपहरिया में अचानक से एक समझ हवाओं के साथ अंदर प्रवेश किया था —जिस चीज़ का पीछा करोगे,
उसके आख़िरी सिरे पर तुम ही खड़े मिलोगे।
वक़्त की रफ़्तार में घूमते-घूमते
आदमी आखिर खुद के ही पास लौट आता है।
बचने की कोई जगह नहीं है।

जो मेरा हिस्सा हैं, वो मुझे समझेगा। वो मुझे ढूंढने की कवायद नहीं करेगा।
समझ और खोज पर्यायवाची होते है। 
वो शोर में नहीं ढूंढेगा मुझे। किसी ढलती धूप में मेरी चुप्पी पढ़ेगा।
वो जानता होगा कि मैं वहीं हूँ—किसी पुराने गीत की तरह...किसी शाम के सन्नाटे में,
या एक कप चाय के पहले घूँट में।

ज़िंदगी कोई रिहर्सल नहीं है।
कोई "कट" नहीं मिलेगा।
जो किया, वो दर्ज़ हो गया।
जो जिया, वो अब इतिहास है।
और चाहकर भी उसे मिटा नहीं सकते।
बस समझ सकते हैं।
और आगे कुछ बेहतर जी सकते हैं।

और इस बीच के पन्नो में लिखी कहानी!
प्यार?
वो पहली बार नहीं होता।
पहली बार तो एक हल्की सी चिंगारी होती है—अधूरी, घबराई हुई।
असल प्यार तब होता है, जब तुम सबकुछ देख चुके होते हो,
और फिर भी रुकते हो।
आख़िरी बार प्यार करना—मतलब किसी के पास टिक जाना।
बिना शर्त, बिना शक,
बिना डर के।

शुरुआत और अंत किताब के कवर हैं।
पर असली कहानी, असली गहराई,
वो तो बीच में है—वहीं जहाँ मैं हूँ।
सचमुच का मैं।



Thursday, April 3, 2025

अराजकता, भ्रम, सत्य, भेड़, भीड़

बात 2013/14 की रही होगी, जब हमलोग अन्ना हजारे को मंच से मिमियाते देख उन्हें शेर मानने की गलती कर बैठे थे। बाद में विवेकानंद फाउंडेशन के बारे में जान कर अपने को ठगा महसूस भी किए थे। 
उन्हीं दिनों मेरा दोस्त जो अन्ना का विरोध करता था, वो एक संत से बराबर मिलता रहता था। उस संत के बारे में सुन – सुन कर उनके प्रति जिज्ञासा भी उत्पन्न हुई थी।
मेरा दोस्त मुझे वहां ले जाना नहीं चाहता था क्योंकि उसके अनुसार मैं इंप्लसिव था और वो संत गलत सवाल करने पर जोर से डंडा मारते थे। 
उस संत के अनुसार व्यक्तियों में अराजकता की शुरुआत हो चुकी है और दिन पर दिन यह दोगुना होता जाएगा। 
अराजकता से आपका क्या मतलब?– मेरा मतलब व्यक्तिगत अराजकता से है, जैसे– आदमी भेड़ बनेगा, तर्क से उसका कोई वास्ता नहीं रहेगा, सूचनाओं को हूबहू स्वीकार करेगा। भ्रम सत्य को ढकता चला जाएगा और एक समय ऐसा भी आएगा जब सत्य की कोई झलक मिलनी भी बंद हो जाएगी और जैसा भेड़ का नियति होता हैं, स्वादिष्ट गोश्त खातिर खत्म कर दिया जाएगा।
उन्हीं दिनों मेरा दोस्त एक एकांकी को निर्देशित किया था जिसका फोटोकॉपी मेरे पास रह गया था, जिसे मैं हूबहू प्रकट कर रहा। 

#एकांकी: सच और भ्रम

पात्र:

1. सत्य – शांत, स्थिर और तर्कशील

2. भ्रम – चंचल, मोहक और छलपूर्ण

3. मनुष्य – दुविधा में पड़ा हुआ

(मंच पर अंधकार है। धीरे-धीरे हल्का प्रकाश फैलता है। मनुष्य बीच में खड़ा है, उलझन में डूबा हुआ। सत्य और भ्रम, दोनों उसके पास खड़े हैं।)

मनुष्य (खुद से): यह कैसा द्वंद्व है? मैं जिस राह पर चलता हूँ, वहाँ कभी रोशनी होती है, कभी धुंध। जो मैं देखता हूँ, क्या वह सच है? या यह सिर्फ एक भ्रम?

भ्रम (मोहक स्वर में): क्यों सोचते हो इतना? जीवन सुंदर है, जैसा तुम्हें दिखता है, वैसा ही तो है। जो मन चाहे, उसे सच मान लो। सुख में जीओ, सपनों में खो जाओ!

सत्य (गंभीर स्वर में): जीवन केवल देखने या मान लेने का नाम नहीं, उसे समझना भी आवश्यक है। जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। भ्रम सुंदर हो सकता है, पर वह टिकता नहीं।

मनुष्य (व्याकुल होकर): लेकिन सत्य कठिन लगता है, और भ्रम सुखद! सत्य की राह में संघर्ष है, और भ्रम में आराम। मैं किसे चुनूँ?

भ्रम (हंसकर): देखो न! मैं तुम्हें कितनी सुंदर कल्पनाओं में ले जा सकता हूँ। बिना प्रयास के, बिना दर्द के! क्या तुम सच्चाई की कठोरता में खुद को झोंकना चाहोगे?

सत्य (शांत लेकिन दृढ़): सत्य कठिन हो सकता है, परंतु वही स्थायी है। भ्रम तुम्हें पल भर का आनंद देगा, लेकिन अंत में दुख ही देगा। सोचो, क्या तुम एक झूठी दुनिया में जीना चाहते हो?

(मनुष्य सोच में पड़ जाता है। मंच पर प्रकाश और अंधकार का खेल चलता है। अंत में, मनुष्य गहरी सांस लेता है और सत्य की ओर बढ़ता है। भ्रम धीरे-धीरे फीका पड़ जाता है।)

मनुष्य (मुस्कुराकर): मैं अब समझ गया। भ्रम मोहक है, लेकिन सत्य ही मेरा मार्ग है।

(सत्य और मनुष्य आगे बढ़ते हैं। मंच पर उजाला फैल जाता है। पर्दा गिरता है।)