सफल होना केवल निजी कारणों से संभव होता है यह सबसे बड़ा झूठ है।
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सफल होना केवल निजी कारणों से सम्भव होता है यह सबसे बड़ा झूठ है। सफलता समाज के योगदान के बाद ही मिलती है। माँ-बाप , भाई-बहन , रिश्तेदार , दोस्त , प्रेमी व कामकाजी साथी व न जाने कितने ही अनजाने लोग हमें हम बनाते हैं। लेकिन जब हम हम बन जाते हैं , तब सीना चौड़ा कर के कह देते हैं कि हमने प्रतिस्पर्धा में सबको पिछड़कर सबको यह मुक़ाम हासिल किया है।
बड़े उद्योगपतियों को एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। वे सोचते हैं कि प्रतिस्पर्धा में जीतना एक क़िस्म की प्रतिभा है। एक प्रतिभा जो उनके पास अधिक है और इसीलिये आज वे अरबों-खरबों में खेल रहे हैं। ऐसा सोचने वाले यह मौलिक बात भूल जाते हैं कि उन्हें उद्योगपति बनाने और उनका मुनाफ़ा उनको देने में न जाने कितने ही आम लोग एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया करते हैं। पूरा समाज मिलकर साथ हाथ बँटाता है , तब उद्योग बनता है और चलता है। और जब वह चल पड़ता है , तब उद्योगपति हाथों को झाड़ कर श्रेय अपनी निजी प्रतिभा को देने लगता है। स्वयं को प्रतिस्पर्धा-विजेता बना कर कॉलर ऊपर करने लगता है।