Tuesday, September 23, 2025

डायरी

┌───────────────────────────── Untitled - Notepad ───────────────────────────┐
│ 24 जनवरी 2016 │
│ अविनाश पाण्डेय │
│ │
│ आज मैंने एक बात बड़े जोर से महसूस की — │
│ ज़िंदगी में स्पष्ट होना कितना जरूरी है। │
│ │
│ निर्णय लेना आसान नहीं होता हैं। │
│ कई बार उसकी कीमत चुकानी पड़ती है — │
│ रिश्ते टूट जाते हैं, मौके निकल जाते हैं, लोग आपको गलत समझते हैं।      
  
│ लेकिन जब भीतर का शोर थमता है, │
│ तब महसूस होता है — यही सही था। │
│ │
│ स्पष्ट मन से लिए गए फैसले │
│ हमेशा सुकून देते हैं। │
│ और यही सुकून भरा मन │
│ सही सोच और सही परिणाम देता है। │
│ │
│ फाइनेंस ने भी एक सबक सिखाया — │
│ पैसा चाहे जैसा हो– जिसका हो, पैसे का स्वभाव है, खर्च होना।                          
│                                                  
│                                                                            
│ सबसे बड़ा सबक — │
│ उधार मत लो │
│ जब तक हालात जान लेने की नौबत न बना दे। │
│ उधार की ज़िंदगी का कंपाउंडिंग तेज़ होता है │
│ और decay भी उतना ही तेज़। │
│ एक बार इस जाल में फँस गए, │
│ निकालना आसान नहीं। │
│ │
│ आज के लिए बस इतना ही– │
│ उमड़ते घुमड़ते विचारों को बाहर फेंक │
│ अब सोते हैं हिप्टोनाइज़ के साथ। │
└─────────────────────────────────────────────────────────

सड़क और यादें

अविनाश पाण्डेय

सड़क और यादें
––––––––––

कभी एक सड़क थी,
धूल भरी, धूप में झुलसती,
और हर कदम पर छोटे-छोटे कदमों की गूँज भर देती।
उस सड़क के किनारे एक इकलौता पेड़ खड़ा रहता,
उसकी छाया में हम घंटों बैठा करते।
उसके पास एक आम का पेड़ भी था,
जो हमेशा ताड़ की ऊँचाई को चुनौती देता।
मैं अक्सर कहता —
“अगर इसे सीधा कर दिया जाए, ताड़ से बड़ा हो जाएगा।”

कभी दोपहरी, कभी शाम,
रोज़ एक लड़की लंगड़ाकर उस रास्ते से आती-जाती।
आँखों में खामोशी,
नजर जमीन पर,
और मन में पैर की कसक।
मेरा दोस्त सहानुभूति से लेकिन
पूर्ण विश्वास के साथ कहता —
“अगर मेरा वस चले, मैं उससे शादी करू।”
मेरे लिए उसकी यह बात सुनना,
किसी अजूबे से कम नहीं था।

समय ने सब बदल दिया।
सड़क अब चमचमाती है,
पेड़ गायब हैं,
लड़की कहीं और है,
और दोस्त शायद भूल चुका है कि उसने यह कहा था।
मैं आज भी जब कभी आम और ताड़ का पेड़ एक साथ देखता हूँ,
मन ही मन मापना शुरू कर देता हूँ —
आम या ताड़, कौन बड़ा?

कभी-कभी, धुंधली याद में,
मुझे लगता है कि वह सड़क फिर से धूल भरी है,
पेड़ झूमते हैं,
लड़की गुजरती है,
और दोस्त दुनिया को दिखाना चाहता है कि
वो लड़की बाहर से लंगड़ी है,
पर अंदर से बेहद खूबसूरत।

लेकिन यह केवल झलक है।
तमाम कहानियां समय के साथ ऐसे गुम हो जाती हैं जैसे कभी थी ही नहीं।

#लाइफ #यादें #लम्हा #लेखक

Sunday, September 14, 2025

जिन्दगी गोल गोल है

ज़िंदगी गोल-गोल है, जैसे पहिया—कल सच था, आज झूठ। प्रकृति अपने चक्र में हमें लगातार चौंकाती है। सोचिए, एवरेस्ट की चोटी की कठोर चट्टान और करोड़ों साल पहले समुद्र की गहराई में डूबी चट्टान—एक ही हैं।

सनातनी संत, महात्मा शंकराचार्य और उनके अनुयायी, इस पर कभी आश्चर्यचकित नहीं हुए। उत्तर उनके पास हमेशा मौजूद था—कल्प की शुरुआत में पृथ्वी सागर में डूबी थी। विष्णु का वाराह अवतार उसे उठाकर सृष्टि की नींव रखता है। यह कथा पद्मपुराण में विस्तार से वर्णित है।

वेद, उपनिषद, पुराण—सैंकड़ों हमले झेले, झूठा कहा गया, लेकिन संत मुस्कुराते रहे, दृष्टा बने रहे। आज वही विज्ञान, अपनी सीमित तर्क शक्ति में अहंकार में डूबा, उन्हीं पत्थरों को प्रमाणित कर रहा है।

और आज, गहराई और रहस्यों से भरी सनातन परंपरा को हिंदू धर्म के नाम पर दबाया जा रहा है। कुछ मुट्ठी भर राजनीतिक पाखंडियों के उकसावे पर, हम वही सनातनी हैं—जो धर्म का अध्ययन किए बिना उसका झंडा उठाकर ढोंग करते हैं।

याद रखिए—हम धर्म को नहीं बचाते; धर्म हमें बचाता है। धर्म अपनी रक्षा खुद करता है।

—अविनाश पाण्डेय

Monday, September 8, 2025

चुप्पी और दूरी के बीच

जीवन में बहुत-सी बातें समझ से परे होती हैं।
जैसे—क्या पहाड़ कठोर है, इसलिए नदियाँ उसे छोड़ गईं?
या नदियाँ छोड़ गईं, इसलिए पहाड़ कठोर हो गया?

जीवन की कुछ सच्चाइयाँ हमेशा धुंध में छिपी रहती हैं।
हम उन्हें पकड़ना चाहते हैं,
पर वे हमारी उंगलियों से फिसल जाती हैं।

क्या पहाड़ का कठोर होना नदियों का दोष था,
या नदियों का जाना उसकी नियति?
ठीक वैसे ही जैसे रिश्तों में—
कभी समझना मुश्किल होता है
कि चुप्पी ने दूरी बनाई,
या दूरी ने चुप्पी को जन्म दिया।

–– अविनाश पाण्डेय

Friday, September 5, 2025

टूटना बिखरना और फिर मुस्कुरा देना


मनुष्य के लिए कोई पीड़ा शाश्वत नहीं।
समय उसे काटता-तराशता है,
जब तक कि दिल थककर उसे स्वीकार न कर ले।

आँसू बहते हैं, फिर सूख जाते हैं।
तन्हाई बोझ नहीं रहती,
एक अनिवार्य साथी बन जाती है।

जिन लोगों को खोया है,
वे स्मृतियों में बदल जाते हैं।
घाव भरते हैं,
और टूटी उम्मीदें धीरे-धीरे
अपनी चुभन खो देती हैं।

— अविनाश पाण्डेय

Tuesday, August 26, 2025

भरोसे की नींद



भरोसे की नींद

दूसरे को चैन से सोते देख
मेरे भीतर भी अजीब-सी नमी उतर आती है।
मानो किसी ने दुनिया को बता दिया हो
कि शांति अभी मरी नहीं है,
भरोसे की गोद में कोई अब भी
निश्चिंत लेटा हुआ है।

किशोरों को खेलते देख
मेरा अपना बीता हुआ समय
हवा की तरह लौट आता है।

किसी घर में बुजुर्गों का मुस्कुराना,
मानो मुझे धरती पर स्वर्ग होने की गवाही देता है।

और जब कोई बच्चा
अपने पिता के कंधे पर झूमता है—
तो दृश्य ऐसा लगता है
जैसे कोई हरा-भरा पेड़ बरसात में
भीगकर कृतज्ञ हो गया हो।
वह झूमना केवल खेल नहीं,
भरोसे का उत्सव है।

ये सब क्षण
किसी किताब में लिखे प्रमाण नहीं हैं—
ये स्वयं जीवन की लिखावट हैं,
जहाँ आँखें और दिल मिलकर
एक ही बात कहते हैं:
यही है सच, यही है जीवन।

— अविनाश पाण्डेय



Monday, August 25, 2025

लौटती हुई शुरुआत



लौटती हुई शुरुआत 
........................

मैंने जाना है—
हमेशा एक नई शुरुआत की जा सकती है।

हर अंत
अदृश्य सीढ़ी पर रखा
पहला पाँव है।

अंधकार का भार
सिर्फ़ उतनी देर तक टिकता है,
जितनी देर प्रकाश
अपनी साँस भर रहा होता है।

हर कठिनाई का अंत सुनिश्चित है –
हर सुख का अंत भी सुनिश्चित है।

सुबह—
घड़ी की सुई नहीं,
बल्कि एक रहस्य है
जो हर बार
अलग चेहरे में लौटता है।

समाधान कोई उत्तर नहीं,
वह तो एक रंग है—
पहली किरण की लालिमा,
जो हर छाया को
धीरे-धीरे निगल लेती है।

कठिनाई का अंत?
वह अंत नहीं,
बल्कि एक दर्पण है
जिसमें जीवन
अपना अगला चेहरा देख लेता है।

— अविनाश पाण्डेय


Monday, August 18, 2025

हवाओं पर लिखी गई स्त्री

"हवाओं पर लिखी गई स्त्री "
------------------------------------

प्रेम में अक्सर समझदारी खो जाती हैं।
खो जाते हैं पुराने चेहरे।
दुनिया सिमटकर एक आवाज़, एक छवि, एक छुअन में कैद हो जाती है।

प्रेम में डूबी स्त्री का संसार बदल जाता है।
वो भावनाओं की विशाल सरहद में,
नींद और जाग के बीच खुशहाल प्रेम और मुस्कुराते प्रेमी का सपना बुनने लगती है।
वो हवाओं से बातें करती है,
बुदबुदाकर मौसम की नाव से संदेश भेजा करती है।

वो चाहती है कि उसका प्रेमी कभी न हारे—
और उसे जिताने के लिए
अपना सर्वस्व दाँव पर लगा देती है।
वो हवाओं के संग उड़ना चाहती हुआ है –
कभी तेज, कभी मद्धम।
किसी ऐसी जगह जाना चाहती है
जहाँ उसकी भावनाओं का एक विशाल साम्राज्य हो—
बादलों का रंग-बिरंगे पंख लगाकर
वो जानना चाहती है कि उसका प्रेमी 
कितनी दूर ले जा सकता है।

वो चिड़िया की तरह होती है—
उड़ान उसकी फितरत होती है,
आज़ादी उसकी साँसों में।
और वह चाहती है कि उसका प्रेमी भी
बदलते आसमान को छू ले,
उसके संग उड़ान भरे।

कल्पनाओं में तिनका-तिनका जोड़कर
वो एक महल बनाती है—
प्रेम के, प्रतीक्षा के, भविष्य के।
पर जब प्रेमी की आँखों में
अपने लिए वो चमक नहीं देखती—
तो स्तब्ध रह जाती है।
अंधेरों में उतर जाती है
एक अकेली प्रतीक्षा लेकर,
कि शायद उसका प्रेमी
फिर उन्हीं आँखों में प्रेम लिए लौटेगा।

पर उसका प्रेमी
प्रेमहीन आँखों से झूठ बोलता है।
और वह स्त्री—
टूट कर बिखर जाती है।
अपने ही हाथों से बिखेर देती है
वो तिनके, वो एक – एक कंकर-पत्थर,
जिनसे उसने अपने सपनों का महल रचा था।

अब वह स्त्री
एक नए रूप में जन्म लेती है।
उसके पर काट चुके प्रेमी की
आँखों में आँसू देखकर
वो खुश होती है।
वो जमाने के लिए कठोर होती जाती है—
एक आत्म-संरक्षित आग की तरह।

स्त्री का सख़्त हो जाना खतरनाक होता है—
और उसे सख़्त बनाने वाला,
सबसे बड़ा अपराधी।

Avinash Pandey 

#एकांकी #novelwriting #गद्य #hindiwriter #निर्मल #hindiwriting #storytelling #authorlife #blogpost #author #ब्लॉगर #लेखक #उपन्यास #कहानी #कहानीवाला #कहानीकार #यादें #नोबेल #novel #seiouswriter #Sansmaran #संस्मरण #मेमोरी

चीजों को टालना या इग्नोर करना

कई बार चीजों को टालना या #इग्नोर करना बहुत महंगा पड़ता हैं।
कई बार हम सोचते हैं — अभी नहीं, बाद में देखेंगे।
लेकिन यही "बाद में" धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी का बोझ बन जाता है।
हर दिन की ओवरथिंकिंग, जो हम हल्के में लेते हैं,
धीरे-धीरे अंदर ही अंदर डिप्रेशन की शक्ल ले लेती है।
जो बात आज सुलझाई जा सकती थी,
वो अनकहेपन में उलझकर कल एक दूराव बन जाती है।
छोटा-सा उधार, जो "अभी नहीं, बाद में" टाल दिया,
वो कब बड़ा कर्ज बन गया, पता ही नहीं चला।
बदन का एक मामूली दर्द,
जिसे इग्नोर किया,
वो कब बीमारी में बदल गया,
वो रिपोर्ट ही बता पाई।

हम सोचते हैं — वक्त है, संभाल लेंगे।
पर वक्त कभी थमता नहीं,
और जिन चीजों को हम टालते हैं,
वो अक्सर हमें नहीं टालतीं।

इसलिए जब अगली बार मन करे कुछ "कल पे टालने" का,
तो बस इतना याद कर लेना —
कहीं वो कल, आज से ज़्यादा भारी न हो जाए।
कहीं जो हल्का लगा था,
वही सबसे बड़ा बोझ न बन जाए।
Avinash Pandey 

#ऑथर #मोटिवेशन #जीवन #आर्टोफ्लाइफ #माइंड #साइकोलॉजी

वो जो हम पीछे छोड़ आए

"वो जो हम पीछे छोड़ आए"
—————————————

प्रकृति जल्द ही उन सारी चीज़ों को वापस ले लेती है,
जिन्हें हम पीछे छोड़ देते हैं —
चाहे वह कोई जगह हो,
कोई रिश्ता,
या अपनी ही कोई पुरानी आदत।

वो हमें जीने देती है जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
लेकिन भीतर ही भीतर वह हर अधूरी चीज़ को
अपने नियमों में पिरोने लगती है।

फिर एक दिन,
जब हम अपने ही जीवन से थोड़े दूर हो जाते हैं —
वो सब कुछ लौट आता है:
किसी पुराने रास्ते की पहचान,
किसी आवाज़ की टीस,
या किसी मौसम की आहट जो जानी-पहचानी लगती है।

हम समझ नहीं पाते कि यह क्या है,
पर भीतर कुछ हिलता है —
जैसे कोई भूला हुआ हिसाब
अचानक फिर से ज़िंदा हो गया हो।

प्रकृति कभी कुछ फेंकती नहीं,
वो सिर्फ इंतज़ार करती है —
कि कब हम फिर उसी मोड़ पर पहुँचें,
जहाँ से चलने का ढंग बिगड़ा था। 

Avinash Pandey 

@highlight 

#ऑथर #माइंड #मोटिवेशन #साइकोलॉजी #author #आर्टोफ्लाइफ #लेखक #गद्य

कल के साए में आज

कल के साए में आज
— अविनाश पाण्डेय

आसान नहीं होता,
किसी के जीवन में आख़िरी मुहब्बत बनना।
तुम्हें सिर्फ़ उसका आज नहीं,
उसका गुज़रा हुआ कल भी सँभालना पड़ता है—
वो पुरानी मोहब्बतें,
जिनकी खुशबू अब भी उसके कमरे की हवा में तैरती है।
उन कहानियों को सुनना होता है
जिनमें तुम्हारा कोई किरदार नहीं।
तुम्हें उसकी आँखों में
वो परछाईं भी देखनी होती है
जो तुम्हारी नहीं,
मगर अब भी वहाँ है।

तुम उसके साथ चलते हो
उन पगडंडियों पर
जहाँ उसके कदम पहले किसी और के साथ धंसे थे।
उसकी हँसी में, उसके स्पर्श में,
उसकी गंध में—
कहीं न कहीं, किसी और का मौसम
अब भी बचा होता है।

और तुम यह जानते हुए भी
कि उसका अतीत तुम्हारा नहीं,
उसके आने वाले दिनों में
अपना स्वाद, अपनी खुशबू, अपना स्पर्श
धीरे-धीरे घोलते हो—
जैसे कोई रात में, बिना आहट,
किसी ठंडे होते जिस्म को
अपनी धड़कनों की ऊष्मा से
फिर से जगा दे।

कही ईश्वर चुप ना हो जाए

मैं गलत करने से इसीलिए बचता हूँ
कि ईश्वर नाराज़ होकर मुझे दंड देगा—ऐसा नहीं।
मैं बचता हूँ इसलिए
कि कहीं उसे बुरा न लगे।

उसने मेरे भीतर एक भरोसा बोया है,
एक यक़ीन कि मैं अंधेरे में भी
उसके दिए उजाले को थामे रहूँगा।

अगर मैंने उस भरोसे को तोड़ दिया,
तो शायद वह चुप हो जाएगा—
और उसकी वह चुप्पी
मेरी सबसे बड़ी सज़ा होगी।

— अविनाश पाण्डेय

रिश्ते का मुँह छुपाना

रिश्ते का मुँह छुपाना
––––––––––––

मैंने देखा है,
प्राथमिकता से लेकर अनदेखा होने तक का सफ़र,
"तुम मेरे सब कुछ हो" से लेकर
"तुम होते कौन हो" तक का सफ़र,
"तुम्हारी बातें बहुत अच्छी लगती हैं" से लेकर
"अब ज़रूरत नहीं रही" तक का सफ़र।

ये सफ़र दरअसल गिरने का था—
रिश्ते के भार से, उम्मीदों की ऊँचाई से,
अपने ही बनाए यक़ीन से।

अख़िर में बचा क्या?
न तुम्हारी नज़दीकी, न मेरी शिकायत,
बस एक चुप्पी—
जो सब कुछ कहकर भी
कुछ नहीं कहती।

— ✍️ अविनाश पाण्डेय

#कृष्णा #गद्य #रिश्ते #अनदेखा #हिंदीसाहित्य #लेखक #एब्सट्रेक

मेरे कृष्णा

कृष्ण!
क्या अद्भुत चरित्र हैं!
दुनिया के सारे किरदार एक तरफ, और महाभारत के कृष्ण अकेले एक तरफ।
हर उम्र को उसकी संपूर्णता में जी लेने वाला एक अकेला मनुष्य—
नटखट बचपन, सहज किशोर,
प्रेम को अमर कर देने वाला प्रेमी,
मित्रता को तीर्थ बना देने वाला मित्र।

कभी रणभूमि में सारथी, तो कभी रण से दूर रहकर रण का नायक।
निहत्थे होकर साम्राज्यों को उखाड़ फेंकने वाला योद्धा।
धर्म को उसके असल रूप में खड़ा कर देने वाला सम्राट।
राग-द्वेष से परे, सुख-दुख से परे,
अपनी हर हार को भी धर्म का श्रृंगार बना देने वाला।

कितनी बार आरोप लगे उस पर—
जन्म से पहले ही मां को बंदी बना लिया गया,
जन्म लिया तो पालनहार बने गोकुल के लोग,
वहां से भी चला गया।
हर जगह से चल देना पड़ा कृष्ण को—
मथुरा, द्वारका, कुरुक्षेत्र—
जहां-जहां गया, हर जगह अधूरापन छोड़ आया।

राधा अब भी यमुना किनारे बैठी है—
कान्हा लौटेगा, इसी आस में।
मां-बाप ने देखा ही क्या उसका बेटा?
पांडव कहते हैं—
कृष्ण! तू था फिर भी हमें वन-वन भटकना पड़ा।
गांधारी कहती है—
तेरे होते मेरे सौ पुत्र मर गए!
रुक्मिणी, सत्यभामा, मित्र—
सबके उलाहने, सबकी शिकायतें—
और कृष्ण बस मुस्कुरा देते हैं।
कैसा विलक्षण धैर्य है!
कितनी अद्भुत शांति!

मृत्यु भी थकावट बन कर आई—
अपनों के विनाश का बोझ लिए
कृष्ण एक पेड़ के नीचे लेटे हैं।
एक शिकारी का तीर आता है—
पांव में लगता है।
कृष्ण न कोई प्रतिकार करते हैं, न कोई शिकायत—
प्रकृति का ऋण चुकता करते हैं।
जीवन से कोई व्यक्तिगत मोह नहीं,
किसी से कोई क्षोभ नहीं।
जो किया, धर्म किया—
जो सहा, सहज सहा।

कृष्ण हमें सिखाते हैं—
हर चीज़ से परे जाकर भी जीवन को निभाना,
हर आरोप को धारण कर लेना,
किसी से कोई हिसाब न मांगना,
निडर, निर्विकार, निरलेप।
यथार्थ को गले लगाकर
उससे प्यार करना ही कृष्ण होना है।
जो कर सके वही कृष्ण हो सकता है—
जो राग-द्वेष से ऊपर उठ सके,
लोभ-लालच को छोड़ सके,
जीवन को समर्पण बना सके,
और मुस्कुरा सके—
हर हार के बाद भी।

   –अविनाश पाण्डेय 

#कृष्णा #कृष्ण #कृष्णजनमाष्टमी #मेरेकान्हा #मेरेकृष्ण

Sunday, April 20, 2025

वो जगह अब खाली नहीं


---

हमारी आख़िरी मुलाक़ात कभी नहीं हुई।
और शायद हो भी नहीं सकती थी।

हम बस मिलते रहे—जैसे दो लोग जो जान चुके हैं कि बात अब आगे नहीं जाएगी,
फिर भी बोलते हैं,
जैसे कोई दास्तान जो रुकने से पहले अपना एक वाक्य पूरा करना चाहती है।

वो हर बार नज़रें चुरा लेती,
और मैं हर बार यही चाहता कि वो देखे—एक बार।
मुझे नहीं,
मेरे भीतर जो बाक़ी था उसे।

मुझे ग़ुस्सा आता था,
बहुत।
जैसे कोई ताले में हाथ मार रहा हो
जिसकी चाबी किसी और की जेब में चली गई हो।

बाद में समझ आया—
उसने नज़रें चुराईं नहीं थीं,
वो बस कहीं और देखने लगी थी।

शायद अब उसकी शामों में
कोई और कॉफ़ी मंगवाता होगा।
किसी और की बातों पर वो उसी तरह सिर झुकाकर हँसती होगी,
जैसे कभी मेरे शब्दों की छाँव में हँसी थी।

मैं जानता हूँ,
उसने कभी मुँह फेरकर मुझे छोड़ा नहीं।
वो तो बस धीरे-धीरे
किसी और के साथ रहने लगी थी—
उसी ख़ामोशी में,
जिसमें हम दोनों एक वक़्त में
एक-दूसरे से दूर होने लगे थे।

हमारी आख़िरी मुलाक़ात नहीं हुई—
पर जो नहीं हुआ,
वही सबसे सच था।
क्योंकि कुछ रिश्ते
एक दरवाज़ा नहीं,
एक खिड़की बनकर छूट जाते हैं—
जिससे हम देखते हैं,
कि वहाँ अब कोई और बैठा है
जहाँ एक वक़्त में
हम थे।

Saturday, April 19, 2025

उस आखिरी बूंद तक

" उस आखिरी बूंद तक"
–––––––––––––

‘Ex बार’ वो जगह थी जहाँ हम अक्सर मिलते थे —
कम रोशनी, धीमा संगीत, और शराब की गंध में डूबी कुछ अधूरी कहानियाँ।

मैं और वह आमने-सामने बैठते, लेकिन हमारे बीच जो सबसे गहरी चीज़ होती — वो कभी मेज़ पर नहीं रखी जाती।
वह वाइन धीरे-धीरे पीती थी, जैसे हर घूंट में कोई भूली हुई याद घुल रही हो।
मैं जैकब्स क्रीक में अपनी चुप्पी डुबोता रहता —
क्योंकि कुछ बातें सिर्फ़ जलती हैं, कही नहीं जातीं।

"कभी सोचा है, अगर हम पहले मिलते?" उसने पूछा, लेकिन उसकी आँखें कहीं और थीं।
"शायद तब भी कुछ छूट जाता," मैंने कहा।
क्योंकि आरज़ू वक़्त की मोहताज नहीं होती,
वो तो बस छूट जाने के लिए पैदा होती है।

उसने हँसते हुए सिर झटक दिया —
वो हँसी नहीं थी, वो थक कर हथियार डाल देने जैसा कुछ था।

बार की खिड़की के बाहर बारिश गिर रही थी —
हम दोनों जानते थे, हम बच सकते थे,
लेकिन भीगना ज़्यादा सच्चा लग रहा था।

वो उठी, और जाते-जाते अपनी खाली ग्लास को एक तरफ सरका दिया —
जैसे कोई अधूरी बात, जो फिर कभी नहीं पूछी जाएगी।
मैं वहीं बैठा रहा — उस गिलास में ठहरी आख़िरी बूँद के साथ,
जिसमें उसका जाना अब भी थोड़ा बाक़ी था।

रेगिस्तानी शाम

"चुप्पियों वाली वो रेगिस्तानी शाम "
--------------------------------------------

वो कोई ख़ास दिन नहीं था।
न कोई मौसम बदला था,
न कोई रिश्ता टूटा था।
फिर भी शाम अजीब थी —
जैसे कुछ सूख गया हो भीतर।

वो शाम किसी दिन की थकान भी नहीं थी,
वो एक उम्र की चुप्पी थी
जो धीरे-धीरे आकर
रेत की तरह सब पर फैल गई थी।

आसमान कुछ नहीं कह रहा था,
फिर भी उसमें कुछ टूट रहा था —
शायद उजाला।

उसकी नीरवता इतनी सघन थी
कि अगर किसी ने साँस भी ली होती,
तो वो भी एक अपराध लगती।

चुप्पियों वाली वो एक रेगिस्तानी शाम थी।

रेगिस्तान में शामें अचानक नहीं आतीं —
वो रेंगती हैं,
जैसे कोई पुरानी याद
धीरे-धीरे दिल पर चढ़ती जाती है।

और जब तक तुम्हें एहसास हो,
तुम उस चुप्पी के बीच अवाक पाए जाते हो,
जहाँ खुद से आँख मिलाने की हिम्मत भी नहीं होती।

इस चुप्पी में कोई संवाद नहीं होता —
फिर भी हर चीज़ बोल रही होती है।

एक टूटे हुए वक़्त की सरगोशियाँ,
एक अधूरे आदमी की साँसें,
एक खोई हुई उम्मीद की गंध...
सब कुछ हवा में है,
पर कुछ भी थामा नहीं जा सकता।

वो अपने साथ एक बोझ लाती है,
जो न कांधे पर रखा जा सकता है,
न किसी से बाँटा जा सकता है।

कभी-कभी ऐसा होता है —
कि वक़्त, जगह और मन —
सब मिलकर एक खालीपन रचते हैं।

ऐसा खालीपन जिसे न भरा जा सकता है,
न भुलाया।

—— Avinash Pandey 

Wednesday, April 9, 2025

"अतीत की परछाइयां"

"जहां मैं हूं"






 "जहाँ मैं हूँ"

शुरुआत कहाँ हुई, ये मालूम था।
एक रोशनी थी, एक रोशनी में आँख खुली।
और अंत?
वो भी साफ़ है। एक दिन सब बंद हो जाएगा।
साँसें, आवाज़ें, ख्वाब—सब।
इसमें कुछ नया नहीं है।
जो चीज़ हमेशा अनजानी रही,
वो था ये बीच का हिस्सा।

यही हिस्सा सबसे मुश्किल था और सबसे सच्चा भी।
इसी में मैंने खुद को खोया, और फिर पाया।
बहुत कुछ चाहा था एक वक़्त में।
भागा, टूटा, लड़ा, हँसा भी…
पर जितना ज़्यादा चीज़ों का पीछा किया,
उतना ही खुद से दूर होता गया था।

 एक दिन बेचैन शहर के एक शांत दुपहरिया में अचानक से एक समझ हवाओं के साथ अंदर प्रवेश किया था —जिस चीज़ का पीछा करोगे,
उसके आख़िरी सिरे पर तुम ही खड़े मिलोगे।
वक़्त की रफ़्तार में घूमते-घूमते
आदमी आखिर खुद के ही पास लौट आता है।
बचने की कोई जगह नहीं है।

जो मेरा हिस्सा हैं, वो मुझे समझेगा। वो मुझे ढूंढने की कवायद नहीं करेगा।
समझ और खोज पर्यायवाची होते है। 
वो शोर में नहीं ढूंढेगा मुझे। किसी ढलती धूप में मेरी चुप्पी पढ़ेगा।
वो जानता होगा कि मैं वहीं हूँ—किसी पुराने गीत की तरह...किसी शाम के सन्नाटे में,
या एक कप चाय के पहले घूँट में।

ज़िंदगी कोई रिहर्सल नहीं है।
कोई "कट" नहीं मिलेगा।
जो किया, वो दर्ज़ हो गया।
जो जिया, वो अब इतिहास है।
और चाहकर भी उसे मिटा नहीं सकते।
बस समझ सकते हैं।
और आगे कुछ बेहतर जी सकते हैं।

और इस बीच के पन्नो में लिखी कहानी!
प्यार?
वो पहली बार नहीं होता।
पहली बार तो एक हल्की सी चिंगारी होती है—अधूरी, घबराई हुई।
असल प्यार तब होता है, जब तुम सबकुछ देख चुके होते हो,
और फिर भी रुकते हो।
आख़िरी बार प्यार करना—मतलब किसी के पास टिक जाना।
बिना शर्त, बिना शक,
बिना डर के।
शुरुआत और अंत किताब के कवर हैं।
पर असली कहानी, असली गहराई,
वो तो बीच में है—वहीं जहाँ मैं हूँ।
सचमुच का मैं।


Tuesday, April 8, 2025

सच और भ्रम

एकांकी: सच और भ्रम

पात्र:

1. मनुष्य – असमंजस में पड़ा हुआ।


2. सत्य – स्थिर, गंभीर, अडिग।


3. भ्रम – चंचल, आकर्षक, छलपूर्ण।



(मंच पर अंधेरा। धीरे-धीरे हल्की रोशनी होती है। मनुष्य बीच में खड़ा है, उलझन में। सत्य और भ्रम उसके सामने हैं—एक शांत, दूसरा मोहक।)

भ्रम (मुस्कुराकर): जीवन आसान है, बस बह जाओ! जो अच्छा लगे, वही सही है। कोई बोझ, कोई सवाल नहीं।

सत्य (दृढ़ स्वर में): आसान रास्ता हमेशा सही नहीं होता। जो चमकता है, वह सच नहीं होता।

मनुष्य (घबराया हुआ): लेकिन सत्य कठिन है, पीड़ादायक भी!

भ्रम (हंसकर): और मैं? मैं सुखद हूँ, मनमोहक भी! बस आँख मूंदो और आनंद लो।

सत्य (कड़क स्वर में): आँखें खोलो! भ्रम पलभर का सुख देता है, लेकिन गिरावट भी उसी से शुरू होती है।

(मनुष्य भ्रम की ओर बढ़ता है, लेकिन ठिठक जाता है। एक क्षण रुकता है, फिर सत्य की ओर मुड़ता है। भ्रम फीका पड़ता है, मंच पर प्रकाश फैलता है।)

मनुष्य (निर्णयात्मक स्वर में): सत्य कठिन सही, पर स्थायी है। मैं भ्रम से मुक्त हूँ!

(पर्दा गिरता है।)

रेगिस्तान की प्रेमिका


---

रेगिस्तान की प्रेमिका

कभी मैं जल नहीं था।
मैं भी धरती था—मटियाला, कोमल, छाया से भरा हुआ।
और वो… वो मेरी देह पर चलती थी नंगे पाँव।
उसके पैरों की छापें मिटती नहीं थीं।
वो चलती थी तो रुक जाती थी हवा, और समय भी।

उसकी हँसी में बारिश की गंध थी।
उसके हाथों में बीज थे—प्रेम के, प्रतीक्षा के।
वो बोती थी सपने, मैं उगाता था सावन।
तब मैं रेगिस्तान नहीं था।
मैं उसके भीतर का हरा भूगोल था,
उसकी आँखों से बहता हुआ।

वो कहती थी—"एक दिन सब रेत हो जाएगा।
तू भी, मैं भी।
और हमारी स्मृति भी इतनी हल्की हो जाएगी कि उड़ जाएगी इस हवा में।"
मैं हँसता था,
क्योंकि मैं नहीं जानता था वक़्त की भूख।

फिर एक दिन वो गई।
ना युद्ध हुआ, ना विद्रोह।
बस ख़ामोशी थी, और उसका जाना।

और उसके बाद, धीरे-धीरे सब सूखता गया।
पहले मेरा पानी, फिर रंग, फिर आवाज़।
मैंने उसकी छाँव के बिना जीना सीखा,
और फिर मैंने जीना छोड़ दिया।

तब से मैं रेगिस्तान हूँ।
विस्तृत।
ख़ामोश।
अकेला।

अब वो लौटे भी,
तो मुझे पहचान न पाए।
अब मैं उसकी स्मृति नहीं, उसका शाप हूँ।
हर वो जगह जहाँ वो हँसी थी,
अब वहाँ गर्म रेत है।

पर जब रात आती है,
और चाँद मेरी उजड़ी छाती पर उतरता है—
कभी-कभी उसका चेहरा दिखता है मुझे।
हवा में उसकी हँसी तैरती है।
मैं छूना चाहता हूँ,
पर मैं जानता हूँ—रेत को कभी आग़ोश नहीं मिलती।

बस बिखराव होता है।
और इंतज़ार।


---



मेरी तीन कविताएं

"मेरी तीन साहित्यिक रचनाएं"
                 
 1

।।समय के खुरदरे काग़ज़ पर।।

किसी ने एक रेखा खींची थी
शब्द नहीं थे,
लेकिन अर्थ भारी थे — जैसे पुराने जूतों में भरी हुई यात्रा

काँपती लौ ने कहा —
मैं बुझूँगी नहीं
जब तक भीतर की अंधेरी बात
ख़ुद को कह न ले

हर दीवार पर
कोई पुराना धब्बा है
जो कहता है —
यहाँ कभी कोई रोया था, चुपचाप

पेड़ हवा से पूछता है —
क्या गिरना ही मेरा उत्तर है?
हवा कहती है —
गिरते हुए ही बीज बनता है

कुछ सन्नाटे
बहुत दूर से आते हैं
जैसे किसी पुराने संवाद की
अबूझ गूँज

और हम —
अपनी ही परछाई में
हर रोज़ कुछ खोते हैं
जैसे प्यास, पानी के पास होकर भी
कम हो जाती है

तो अब
अपने भीतर उतरना सीखो
जैसे जल में जल उतरता है
बिना आवाज़, बिना नाम

और जब लौटो —
तो अपने साथ
थोड़ी ख़ामोशी लेकर लौटो
ताकि दुनिया को
कभी खुद से सुनने की आदत पड़ जाए।
    
 अविनाश पाण्डेय 

---
2

|| यादों की कोठरी ||

एक पुरानी कोठरी है
दिमाग़ के सबसे पीछे
जहाँ धूल नहीं जमती
सिर्फ़ साँसें ठहरी रहती हैं

वहीं पड़ी है
वो हँसी जो अधूरी रह गई थी
एक गिलास — आधा पानी, आधा इंतज़ार
और एक पत्र — जिसमें नाम मिट चुका है

यादें चीज़ें नहीं होतीं
वे हवा की तह में छुपी
एक पुरानी गंध होती हैं
या चाय के कप में बचा
वो आख़िरी घूँट, जो कोई पी नहीं पाया

कुछ शामें लौट आती हैं
किसी पुराने गाने की तरह
जिसे सुने तो थे
मगर समझा बहुत बाद में

एक खिड़की थी उस घर में —
खुलती थी पश्चिम की ओर
अब वो घर नहीं रहा
पर वो दिशा अब भी भीतर खुलती है

यादों को सहेजना
जैसे धूप को हथेली में भरना
वो जलती नहीं
पर थोड़ी देर तक
हमारे भीतर सब कुछ रोशन कर जाती है

और जब हम थक जाते हैं
तो वही कोठरी
एक चुप्पी बनकर
हमारे सिरहाने बैठ जाती है
जैसे कोई पुराना दोस्त
कुछ न कहकर भी
सब कह देता है।

--- अविनाश पाण्डेय

3

|| पत्थर बोला पानी से ||

पत्थर बोला पानी से —
मैं स्थिर हूँ, तू क्यों बहता है?
पानी हँस पड़ा —
तू भीतर का कंपन नहीं जानता

टहनियाँ झुक रही हैं
लेकिन जड़ें गीत गा रही हैं
हर झुकाव के नीचे
एक इनकार की गूँज होती है

दिशाएँ भी कभी-कभी थक जाती हैं
और हवाओं से पूछती हैं —
क्या लौटना भी एक यात्रा है?
या सिर्फ़ एक और भूल?

एक आँख, दूसरी आँख में
रात भर उजाला उगाती है
नींद कोई समाधान नहीं —
वो तो बस एक और प्रश्न की देहरी है

छायाएँ अब बात नहीं करतीं
वे बस दीवारों पर
अपने पुराने प्रश्न चिपकाती हैं
जैसे कोई भूला हुआ वादा

कभी-कभी,
कंधों पर रखा हाथ
पूरी पृथ्वी जैसा भारी होता है
और मुस्कान —
केवल एक सूती पर्दा, भीगे हुए दुःख पर

इसलिए,
चुप रहो —
जैसे मिट्टी चुप रहती है बीज के इंतज़ार में
जैसे कल चुप रहता है
आज की साँसों में

और जब बोलो —
तो अपने भीतर के मौसम से बोलो
ताकि आवाज़ में
कोई दिशा काँप उठे।

अविनाश पाण्डेय 
––––––––


जहां मैं हूं






 "जहाँ मैं हूँ"

शुरुआत कहाँ हुई, ये मालूम था।
एक रोशनी थी, एक रोशनी में आँख खुली।
और अंत?
वो भी साफ़ है। एक दिन सब बंद हो जाएगा।
साँसें, आवाज़ें, ख्वाब—सब।
इसमें कुछ नया नहीं है।
जो चीज़ हमेशा अनजानी रही,
वो था ये बीच का हिस्सा।

यही हिस्सा सबसे मुश्किल था और सबसे सच्चा भी।
इसी में मैंने खुद को खोया, और फिर पाया।
बहुत कुछ चाहा था एक वक़्त में।
भागा, टूटा, लड़ा, हँसा भी…
पर जितना ज़्यादा चीज़ों का पीछा किया,
उतना ही खुद से दूर होता गया था।

 एक दिन बेचैन शहर के एक शांत दुपहरिया में अचानक से एक समझ हवाओं के साथ अंदर प्रवेश किया था —जिस चीज़ का पीछा करोगे,
उसके आख़िरी सिरे पर तुम ही खड़े मिलोगे।
वक़्त की रफ़्तार में घूमते-घूमते
आदमी आखिर खुद के ही पास लौट आता है।
बचने की कोई जगह नहीं है।

जो मेरा हिस्सा हैं, वो मुझे समझेगा। वो मुझे ढूंढने की कवायद नहीं करेगा।
समझ और खोज पर्यायवाची होते है। 
वो शोर में नहीं ढूंढेगा मुझे। किसी ढलती धूप में मेरी चुप्पी पढ़ेगा।
वो जानता होगा कि मैं वहीं हूँ—किसी पुराने गीत की तरह...किसी शाम के सन्नाटे में,
या एक कप चाय के पहले घूँट में।

ज़िंदगी कोई रिहर्सल नहीं है।
कोई "कट" नहीं मिलेगा।
जो किया, वो दर्ज़ हो गया।
जो जिया, वो अब इतिहास है।
और चाहकर भी उसे मिटा नहीं सकते।
बस समझ सकते हैं।
और आगे कुछ बेहतर जी सकते हैं।

और इस बीच के पन्नो में लिखी कहानी!
प्यार?
वो पहली बार नहीं होता।
पहली बार तो एक हल्की सी चिंगारी होती है—अधूरी, घबराई हुई।
असल प्यार तब होता है, जब तुम सबकुछ देख चुके होते हो,
और फिर भी रुकते हो।
आख़िरी बार प्यार करना—मतलब किसी के पास टिक जाना।
बिना शर्त, बिना शक,
बिना डर के।

शुरुआत और अंत किताब के कवर हैं।
पर असली कहानी, असली गहराई,
वो तो बीच में है—वहीं जहाँ मैं हूँ।
सचमुच का मैं।



Thursday, April 3, 2025

अराजकता, भ्रम, सत्य, भेड़, भीड़

बात 2013/14 की रही होगी, जब हमलोग अन्ना हजारे को मंच से मिमियाते देख उन्हें शेर मानने की गलती कर बैठे थे। बाद में विवेकानंद फाउंडेशन के बारे में जान कर अपने को ठगा महसूस भी किए थे। 
उन्हीं दिनों मेरा दोस्त जो अन्ना का विरोध करता था, वो एक संत से बराबर मिलता रहता था। उस संत के बारे में सुन – सुन कर उनके प्रति जिज्ञासा भी उत्पन्न हुई थी।
मेरा दोस्त मुझे वहां ले जाना नहीं चाहता था क्योंकि उसके अनुसार मैं इंप्लसिव था और वो संत गलत सवाल करने पर जोर से डंडा मारते थे। 
उस संत के अनुसार व्यक्तियों में अराजकता की शुरुआत हो चुकी है और दिन पर दिन यह दोगुना होता जाएगा। 
अराजकता से आपका क्या मतलब?– मेरा मतलब व्यक्तिगत अराजकता से है, जैसे– आदमी भेड़ बनेगा, तर्क से उसका कोई वास्ता नहीं रहेगा, सूचनाओं को हूबहू स्वीकार करेगा। भ्रम सत्य को ढकता चला जाएगा और एक समय ऐसा भी आएगा जब सत्य की कोई झलक मिलनी भी बंद हो जाएगी और जैसा भेड़ का नियति होता हैं, स्वादिष्ट गोश्त खातिर खत्म कर दिया जाएगा।
उन्हीं दिनों मेरा दोस्त एक एकांकी को निर्देशित किया था जिसका फोटोकॉपी मेरे पास रह गया था, जिसे मैं हूबहू प्रकट कर रहा। 

#एकांकी: सच और भ्रम

पात्र:

1. सत्य – शांत, स्थिर और तर्कशील

2. भ्रम – चंचल, मोहक और छलपूर्ण

3. मनुष्य – दुविधा में पड़ा हुआ

(मंच पर अंधकार है। धीरे-धीरे हल्का प्रकाश फैलता है। मनुष्य बीच में खड़ा है, उलझन में डूबा हुआ। सत्य और भ्रम, दोनों उसके पास खड़े हैं।)

मनुष्य (खुद से): यह कैसा द्वंद्व है? मैं जिस राह पर चलता हूँ, वहाँ कभी रोशनी होती है, कभी धुंध। जो मैं देखता हूँ, क्या वह सच है? या यह सिर्फ एक भ्रम?

भ्रम (मोहक स्वर में): क्यों सोचते हो इतना? जीवन सुंदर है, जैसा तुम्हें दिखता है, वैसा ही तो है। जो मन चाहे, उसे सच मान लो। सुख में जीओ, सपनों में खो जाओ!

सत्य (गंभीर स्वर में): जीवन केवल देखने या मान लेने का नाम नहीं, उसे समझना भी आवश्यक है। जो दिखता है, वह हमेशा सच नहीं होता। भ्रम सुंदर हो सकता है, पर वह टिकता नहीं।

मनुष्य (व्याकुल होकर): लेकिन सत्य कठिन लगता है, और भ्रम सुखद! सत्य की राह में संघर्ष है, और भ्रम में आराम। मैं किसे चुनूँ?

भ्रम (हंसकर): देखो न! मैं तुम्हें कितनी सुंदर कल्पनाओं में ले जा सकता हूँ। बिना प्रयास के, बिना दर्द के! क्या तुम सच्चाई की कठोरता में खुद को झोंकना चाहोगे?

सत्य (शांत लेकिन दृढ़): सत्य कठिन हो सकता है, परंतु वही स्थायी है। भ्रम तुम्हें पल भर का आनंद देगा, लेकिन अंत में दुख ही देगा। सोचो, क्या तुम एक झूठी दुनिया में जीना चाहते हो?

(मनुष्य सोच में पड़ जाता है। मंच पर प्रकाश और अंधकार का खेल चलता है। अंत में, मनुष्य गहरी सांस लेता है और सत्य की ओर बढ़ता है। भ्रम धीरे-धीरे फीका पड़ जाता है।)

मनुष्य (मुस्कुराकर): मैं अब समझ गया। भ्रम मोहक है, लेकिन सत्य ही मेरा मार्ग है।

(सत्य और मनुष्य आगे बढ़ते हैं। मंच पर उजाला फैल जाता है। पर्दा गिरता है।)

Wednesday, March 26, 2025

बस यू ही

बस यूँ ही...

कभी-कभी ज़िंदगी चलती रहती है — बिना किसी वजह, बिना किसी मंज़िल के... बस यूँ ही।

हम सवाल करते हैं, जवाब तलाशते हैं, मगर कुछ सवालों का कोई जवाब नहीं होता। वो हवा में तैरते रहते हैं, जैसे अधूरे ख़्वाब। हम हर रोज़ वही रास्ते दोहराते हैं, वही चेहरे, वही रूटीन — और दिल के किसी कोने से एक आवाज गूंजती रहती हैं, "आखिर ये सब क्यों?"

पर ज़िंदगी कोई सफाई नहीं देती। वो बस कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाती है।

कभी खुशी मिलती है, तो हम पूछते हैं, "मैंने ऐसा क्या किया जो ये नसीब हुआ?"
और जब दर्द मिलता है, तो सवाल और गहरा हो जाता है, "मैंने क्या गुनाह किया था?"

मगर ज़िंदगी हर बार चुप रहती है — जैसे कह रही हो, "सब कुछ इसलिए नहीं होता कि उसकी कोई वजह हो… कुछ चीज़ें बस यूँ ही हो जाती हैं।"

कभी लोग साथ छोड़ जाते हैं — बिना अलविदा कहे, बिना वजह बताए।
कभी हम खुद लोगों से दूर हो जाते हैं — बिना किसी ठोस कारण के, बस दिल थक जाता है।
कभी कोई सपना अधूरा रह जाता है, और हम आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं — पर उस अधूरेपन की गूंज भीतर कहीं रह जाती है।

शायद यही ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच है — हर चीज़ की वजह जरूरी नहीं होती।
कुछ रिश्ते, कुछ रास्ते, कुछ फैसले, और कुछ अधूरी कहानियाँ… ये सब बस यूँ ही होते हैं।

और शायद हमें हर बार वजह ढूंढनी भी नहीं चाहिए।
कभी-कभी जीना भी तो… बस यूँ ही अच्छा लगता है।

@highlight

वजह बेवजह होती हैं

वजहें बेवजह होती हैं...

कभी-कभी हम ज़िंदगी में किसी चीज़ के पीछे भागते हैं — एक मुकाम, एक इंसान, एक ख्वाब — ये सोचकर कि जब वो मिल जाएगा, तो सब ठीक हो जाएगा। मगर जब वो मिल भी जाता है, तो दिल के खाली कोने वैसे के वैसे रह जाते हैं। तब एहसास होता है कि शायद हम जिसे वजह मानकर जी रहे थे, वो खुद एक बेवजह तलाश थी।

इश्क़ में भी ऐसा ही होता है — हम किसी से मोहब्बत कर बैठते हैं, बिना ये सोचे कि क्यों। जब कोई पूछता है, "तुम उसे इतना चाहते क्यों हो?" तो हमारे पास कोई ठोस जवाब नहीं होता। सच तो ये है कि मोहब्बत की सबसे बड़ी वजह यही है कि उसकी कोई वजह नहीं होती।

कभी-कभी हम किसी से नाराज हो जाते हैं, रूठ जाते हैं, यहां तक कि उनसे दूर चले जाते हैं। मगर जब खुद से पूछते हैं कि असल ग़लती क्या थी, तो जवाब धुंधला सा लगता है। शायद दर्द की सबसे बड़ी सच्चाई यही है — वो बिना वजह भी जिंदा रहता है।

और कभी ज़िंदगी हमें ऐसे मोड़ पर ला खड़ा करती है, जहां हम हार मान लेते हैं, बिना जाने कि हार किससे हो रही है। हम थक जाते हैं, बिना जाने कि किससे लड़ रहे हैं। शायद, ये लड़ाई भी बेवजह होती है — जैसे जीना कभी-कभी बेवजह हो जाता है।

पर शायद ज़िंदगी का असली जादू भी इसी में छिपा है — जब वजहें खत्म हो जाती हैं, तब असली जीना शुरू होता है। जब हम सवाल पूछना छोड़ देते हैं, तब जवाब खुद आने लगते हैं।

क्योंकि कुछ एहसास, कुछ रिश्ते, और कुछ सफर... वजहों के मोहताज नहीं होते।
वो बस होते हैं — बेवजह।