Sunday, December 27, 2020

' डिजीज ऑफ मी'

'डिजीज ऑफ मी'
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तब मेरा आत्मसम्मान उफान पर था। जरा - जरा सी बातें आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाती मालूम पड़ती थी। तब मैं अभी-अभी  दुनियां के जंगली भीड़ में निकला ही था। कोई इधर हमला करता कोई उधर तो कोई सामने से! तो कोई चुपके से पीछे वार करता। मेरा आत्मसम्मान भी      'डिजीज ऑफ मी' से पीड़ित था। मेरे साथ ही ऐसा क्यों? मेरे साथ ही ऐसा कैसे हो सकता है? मैंने जब उसका कुछ बिगाड़ा नहीं तो वो मेरा कैसे बिगाड़ सकता हैं? 
आह... इसने तो उल्टे मेरी इंसल्टी कर दी! अरे! यह तो उल्टा मेरे साथ बतमिजी भी कर रहा! 
आत्मसम्मान में सेंध लगनी शुरू थी, अब मेरी बचाने की कोशिश भी आधे - अधूरे मन से ही हो रहा था क्योंकि अब मै जंगली दुनिया के हिंसक जानवरों के बीच में था जिनके लिए मानवता किताबो की बात थी तो मुझे अपना पूरा ध्यान उनसे बचने में ही लगानी थी। 
इन्हीं जंगलों और जानवरों के बीच मैंने सीखा कि जानवर अपने स्वभाव से पेश आएंगे और मुझे अपने स्वभाव को बचाएं रखना हैं।
असमंजस से भरे हुए उन दिनों मेरे अंदर कई सवाल थे जिसको पूछने का सबब नासमझी ही समझी जाती या कोई गुरु मिल नहीं पाया था जिससे मै सवाल करता। वैसी ही किसी भरी दोपहरी तपने के बाद शाम के धुंधलके में पार्क के बेंच पर बैठे ठंडी हवा ने मुझे यह बताया था - दिल ( विजडम) जानता हैं कि हर सवाल का जवाब नहीं होता! बीतते समय के साथ सवाल खुद जवाब बनने लगता हैं अगर आप वाकई धैर्य के साथ  आगे बढ़ चुके हो तब। 
समय गुजर रहा था... मै भी समय के रथ पर सवार साथ आगे बढ़ता था मगर जरा भी चूक होने पर गिर पड़ता था। यह गिरना सिर्फ गिरना नहीं था, दर्द के स्याह सागर में डूबने उतराने जैसा था। खुद को कई टुकड़ों में देखता, बिखर चुके टुकड़ों को बटोरता, हिम्मत कर वापस से जोड़ता और फिर से समय के रथ के पीछे दौड़ पड़ता... लेकिन तब तक समय दूर... काफी दूर निकल चुका होता था। 
ऐसे ही किसी पतझड़ वाले उदास मौसम में मैंने अपने आत्मसम्मान को दो भागों में बंटे देख चौक गया था। यह क्या! अरे! इसे तो मै आत्मसम्मान मान रहा था? अरे!                 यह तो   ' डिजीज ऑफ मी' निकला? गॉड! 
यह तो अहंकार है जो गिरगिट की तरह रंग बदलने में माहिर होता है! तो क्या अभी तक मै सांप को पाल रहा था? मन चौक उठा था और सोंच रहा था " मुझे अपने अंधेरे कोनों में उजाला भर देनी है ताकि कोई शत्रु उसमें छुप कर रह नहीं पाए"
नीले आसमान को पतझड़ से कोई लेना देना नहीं था। वो शानदार दिख रहा था। शानदार चीज़े आकर्षित किया करती हैं। मै भी आकर्षित था, नजरे पूरे आसमान को समग्र देख रही थी। मन हल्का था इसलिए शांत होता जा रहा था।
 दूर आसमान में एक कौवा बाज के पीछे दौड़ रहा था, कौवा को यह गलतफहमी हो रही थी कि बाज उससे डर कर भाग रहा हैं। मुझे हंसी आ रही थी क्योंकि मुझे पता था कि बाज कौवा को उलझाएं हुए दूर बहुत ऊपर आकाश में लेे जाएगा जहां ऑक्सीजन बहुत कम होगा और वो कौवा दम घुटने के कारण खुद नीचे गिर पड़ेगा। 

अविनाश पांडेय

Sunday, December 20, 2020

कर्मो का बाई प्रोडक्ट

ठंड की अल्साई सुबह हैं। दो दिनों से ठंड भी बढ़ी है और आलस भी। लेकिन मन व्यग्र है - इस ठंड में पापा ठीक से रह रहे या नहीं... फोन पर तो हमेशा ही दिलासा देते है कि ठीक से रह रहे है लेकिन मै जानता हूं उनका बच्चो वाली हरकत! 
कभी मै बच्चा था तो वो चिंतित होते थे अब वो बुजुर्ग है तो मै चिंतित। कितना सीधा है यह समीकरण। मेरा देखा - देखी मेरे बच्चे भी वही सवाल करते है - टोपी पहने है? व्यायाम करते है? ठंड में गर्म पानी पीजिएगा! 
सब के सब डॉक्टर ही हो गए हो? बाप का वहीं हाल और बेटा का भी। पापा चिढ़ते हुए पोत्र पर गुस्साते हैं।
एक रात मेरे बेटे ने बड़े दुखी मन से मुझे बताया - " पता है पापा, वो बगल वाले दादा जी है ना? आज रो रहे थे। अंकल थोड़ा भी ध्यान नहीं देते और डांटते रहते हैं। आंटी तो जैसे कोसती रहती है हमेशा और भैया लोग भी देखा - देखी  थोड़ी भी इज्जत नहीं करते।" 
मेरे पास इसका जवाब था लेकिन बच्चे समझ नहीं पाएंगे, वे तो देखा देखी ही सीखते हैं। अपने पापा का दादा जी से व्यवहार ही उन्हें प्रेरित करता है कि वो अपने पापा से कैसा व्यवहार करने वाले है।
मै अपने बच्चे से कहना चाहता था कि बेटा यह जो दादा जी भुगत रहे हैं ना ये कर्मो का फल हैं... उन्होंने भी अपने पापा के साथ ऐसा ही किया होगा। लेकिन कह नहीं पाया और बस इतना ही कहा - " बेटा बड़े बुजुर्गो के साथ कभी भी तेज़ आवाज़ में बात नहीं करनी चाहिए और उन्हें हंसाना चाहिए क्योंकि वो हसेंगे तभी तो आशीर्वाद स्वरूप अपना अनुभव बाटेंगे, किस्से कहेंगे और कई ऐसी बाते बताएंगे जो तुम्हारे बाप को भी नहीं पता होगा। वे आशीर्वाद देंगे तुम्हारे खुशहाल भविष्य के लिए और उनका आशीर्वाद सच साबित होगा। 
भैया लोगो को तो दादा जी कोई आशीर्वाद नहीं देते? सही करते है दादा जी क्योंकि भैया लोग तेज बोलता है उनसे। बेटा ऊंघती नींद में बड़बड़ाया। 

Tuesday, May 19, 2020

यह सबसे बड़ा झूठ है कि हमारी सफलता सिर्फ हमारी मेहनत का परिणाम है।

सफल होना केवल निजी कारणों से संभव होता है यह सबसे बड़ा झूठ है।
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सफल होना केवल निजी कारणों से सम्भव होता है  यह सबसे बड़ा झूठ है। सफलता समाज के योगदान के बाद ही मिलती है। माँ-बाप , भाई-बहन , रिश्तेदार , दोस्त , प्रेमी व कामकाजी साथी व न जाने कितने ही अनजाने लोग हमें हम बनाते हैं। लेकिन जब हम हम बन जाते हैं , तब सीना चौड़ा कर के कह देते हैं कि हमने प्रतिस्पर्धा में सबको पिछड़कर सबको यह मुक़ाम हासिल किया है। 
                                  बड़े उद्योगपतियों को एक बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। वे सोचते हैं कि प्रतिस्पर्धा में जीतना  एक क़िस्म की प्रतिभा है। एक प्रतिभा जो उनके पास अधिक है और इसीलिये आज वे अरबों-खरबों में खेल रहे हैं। ऐसा सोचने वाले यह मौलिक बात भूल जाते हैं कि उन्हें उद्योगपति बनाने और उनका मुनाफ़ा उनको देने में न जाने कितने ही आम लोग एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया करते हैं। पूरा समाज मिलकर साथ हाथ बँटाता है , तब उद्योग बनता है और चलता है। और जब वह चल पड़ता है , तब उद्योगपति हाथों को झाड़ कर श्रेय अपनी निजी प्रतिभा को देने लगता है। स्वयं को प्रतिस्पर्धा-विजेता बना कर कॉलर ऊपर करने लगता है।

काईजेन विधि। आपने अपनाया क्या?

यह मानव मन का सहज स्वभाव माना गया है कि वह तुरंत लाभ चाहता है।
मोटिवेशनल से हम आगे तो बढ़ते है मगर कल भी बढ़ेंगे इसका निर्धारण अनुशासन से होता है। 
जापानी लोगो को मै इस पृथ्वी पर सबसे लायक मनुष्य मानता हूं, जो अपने होने की सार्थकता को साबित किए है। 
जापानी लोग एक दिन ज्यादा करने की अपेक्षा  निरंतरता में विश्वास करते है। 
काईजेन जापान में प्रचलित एक विधि है जिसे हर जापनिस अपने व्यवहार और आदत में शामिल करता है। 
काईजेन के अनुसार, किसी गोल को इतने छोटे टुकड़ों में बाट दो की गोल को भी शर्म अा जाए।
जैसे अगर आप 30 kg वजन उठा सकते है तो शुरुआत 2 केजी से करे और रोज 100 ग्राम बढ़ाते जाए।
किसी दिन व्यायाम करते है, किसी दिन नहीं करते है तो इसका मतलब आपका मन डरा हुआ है, तो सिर्फ व्यायाम की सोच कर खड़े भर हो जाए। खुद ब खुद व्यायाम होता जाएगा। 
लिखने पढ़ने का मन नहीं कर रहा है तो सिर्फ हाथो में कलम लेे, बाकी आपका मकसद सिर्फ हाथो में कलम लेने भर से ही पूरा हो जाएगा।
सुबह उठने में सालो से दिक्कत हो रही है, कैजेन बोलता है कि जो टाइम आपके जागने का है उससे सिर्फ एक मिनट पहले का अलार्म लगाए। यह एक मिनट 60 दिन में एक घंटा का फर्क लाएगा और आपके बायोलॉजिकल क्लॉक को मेनटेन भी करेगा। 
कोई लैंग्वेज सीखनी हो तो रोज एक ही वर्ड सीखो, और एक दिन आप पूरा सीख जायेंगे। 
तात्पर्य यह कि एक ही दिन ज्यादा करने से बेहतर है रोज थोड़ा थोड़ा करना और निरंतर करना। 
नई आदत विकसित करने में भी यह काफी मजेदार विधि मानी गई है। 
                                                     

Friday, May 8, 2020

ज़िन्दगी खूबसूरत है

"What is true by candlelight is not always true by sunlight.":)

 मैं जब इस शहर में आया था तो मेरे सपने बहुत क्लियर थे, उस सपने के लिए दिन -रात काफी मेहनत की थी मैंने। तब तक शायद मैंने यही सीखा था की अगर हम कुछ नया करे तो सोशल अपलिफ्टमेंट में कुछ मदद होती है। पर यहाँ आने के बाद बहुत बुरे अनुभव हुए- काफी कुछ सिख भी गया। मेरा माइंड सेट कभी भी इस शहर से जुड़ नहीं पाया था। 
यह शहर जितनी मीठी है उतनी सख्त भी है। 
लेकिन सिर्फ कुछ महीनो से एक अजीब सा प्यार हो गया है इस शहर से! इसकी वजह क्या है? क्या मेरा एक्सीटिंग कैरियर? मेरी छोटी सी दुनिया या कुछ और या फिर उसकी पसंद की सांग्स ? वह जिसने मुझे अहसास कराया की अपने प्रोफाइल को भूल कर देखे, यह शहर खूबसूरत है। 
अपनी मंजिल के पीछे दौड़ते हुए हमारी नज़र कई बातो से हट जाती है। इसलिए कुछ देर के लिए ही सही अपनी बिजी जिंदगी से नज़र हटाइये और उस स्पेशल अहसास को ढूंढिए जो आपकी शहर आपकी जिंदगी को और भी खूबसूरत बनाता है।

Thursday, May 7, 2020

आप कितने खुश है

लॉक डाउन सबकी हंसी गुम कर चुका है। कुछ अभी भी मुस्कुरा सकते है।
आपकी परेशानियां इस बात पर निर्भर करती है कि आप भविष्य कि आशंकाओं के लेकर कितने चिन्तित है।
असल में हमारा दिमाग सूचनाओं का पुलिंदा है जो हमारे विचारो से नियंत्रित होता है। संकट को हर व्यक्ति वैसे ही देखता है जैसा उसके अंदर विचार है। पॉजिटिव विचार कुछ खास कैमिकल यानिं हार्मोन्स का स्राव कर हमे खुश करते है तो नेगेटिव विचार तनाव पैदा करने वाले कार्टिसोल हार्मोन्स पैदा कर तनाव देते है।
अभ्यास से नकारात्मक विचारो को कम और सकारात्मक विचारों को ज्यादा किया जा सकता है पर इसके लिए विचारो के ऊपर  हमें फिल्टर लगाना होगा जो तुरंत नकारात्मक विचारों को छान कर बाहर का रास्ता दिखाएं मन में घुसने ही नहीं दे और सकारात्मक विचारों को पोषित करे।
इसके बाद हम दिमाग की केमिस्ट्री यानी हार्मोन्स के संतुलन पर खुद अच्छा प्रभाव डाल सकते है। यही केमिस्ट्री हमारे फिजिक्स यानी शरीर पर भी असर डालकर बीमारी से बचाती है।