Sunday, December 20, 2020

कर्मो का बाई प्रोडक्ट

ठंड की अल्साई सुबह हैं। दो दिनों से ठंड भी बढ़ी है और आलस भी। लेकिन मन व्यग्र है - इस ठंड में पापा ठीक से रह रहे या नहीं... फोन पर तो हमेशा ही दिलासा देते है कि ठीक से रह रहे है लेकिन मै जानता हूं उनका बच्चो वाली हरकत! 
कभी मै बच्चा था तो वो चिंतित होते थे अब वो बुजुर्ग है तो मै चिंतित। कितना सीधा है यह समीकरण। मेरा देखा - देखी मेरे बच्चे भी वही सवाल करते है - टोपी पहने है? व्यायाम करते है? ठंड में गर्म पानी पीजिएगा! 
सब के सब डॉक्टर ही हो गए हो? बाप का वहीं हाल और बेटा का भी। पापा चिढ़ते हुए पोत्र पर गुस्साते हैं।
एक रात मेरे बेटे ने बड़े दुखी मन से मुझे बताया - " पता है पापा, वो बगल वाले दादा जी है ना? आज रो रहे थे। अंकल थोड़ा भी ध्यान नहीं देते और डांटते रहते हैं। आंटी तो जैसे कोसती रहती है हमेशा और भैया लोग भी देखा - देखी  थोड़ी भी इज्जत नहीं करते।" 
मेरे पास इसका जवाब था लेकिन बच्चे समझ नहीं पाएंगे, वे तो देखा देखी ही सीखते हैं। अपने पापा का दादा जी से व्यवहार ही उन्हें प्रेरित करता है कि वो अपने पापा से कैसा व्यवहार करने वाले है।
मै अपने बच्चे से कहना चाहता था कि बेटा यह जो दादा जी भुगत रहे हैं ना ये कर्मो का फल हैं... उन्होंने भी अपने पापा के साथ ऐसा ही किया होगा। लेकिन कह नहीं पाया और बस इतना ही कहा - " बेटा बड़े बुजुर्गो के साथ कभी भी तेज़ आवाज़ में बात नहीं करनी चाहिए और उन्हें हंसाना चाहिए क्योंकि वो हसेंगे तभी तो आशीर्वाद स्वरूप अपना अनुभव बाटेंगे, किस्से कहेंगे और कई ऐसी बाते बताएंगे जो तुम्हारे बाप को भी नहीं पता होगा। वे आशीर्वाद देंगे तुम्हारे खुशहाल भविष्य के लिए और उनका आशीर्वाद सच साबित होगा। 
भैया लोगो को तो दादा जी कोई आशीर्वाद नहीं देते? सही करते है दादा जी क्योंकि भैया लोग तेज बोलता है उनसे। बेटा ऊंघती नींद में बड़बड़ाया। 

No comments:

Post a Comment