कभी-कभी ज़िंदगी चलती रहती है — बिना किसी वजह, बिना किसी मंज़िल के... बस यूँ ही।
हम सवाल करते हैं, जवाब तलाशते हैं, मगर कुछ सवालों का कोई जवाब नहीं होता। वो हवा में तैरते रहते हैं, जैसे अधूरे ख़्वाब। हम हर रोज़ वही रास्ते दोहराते हैं, वही चेहरे, वही रूटीन — और दिल के किसी कोने से एक आवाज गूंजती रहती हैं, "आखिर ये सब क्यों?"
पर ज़िंदगी कोई सफाई नहीं देती। वो बस कंधे उचकाकर आगे बढ़ जाती है।
कभी खुशी मिलती है, तो हम पूछते हैं, "मैंने ऐसा क्या किया जो ये नसीब हुआ?"
और जब दर्द मिलता है, तो सवाल और गहरा हो जाता है, "मैंने क्या गुनाह किया था?"
मगर ज़िंदगी हर बार चुप रहती है — जैसे कह रही हो, "सब कुछ इसलिए नहीं होता कि उसकी कोई वजह हो… कुछ चीज़ें बस यूँ ही हो जाती हैं।"
कभी लोग साथ छोड़ जाते हैं — बिना अलविदा कहे, बिना वजह बताए।
कभी हम खुद लोगों से दूर हो जाते हैं — बिना किसी ठोस कारण के, बस दिल थक जाता है।
कभी कोई सपना अधूरा रह जाता है, और हम आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं — पर उस अधूरेपन की गूंज भीतर कहीं रह जाती है।
शायद यही ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच है — हर चीज़ की वजह जरूरी नहीं होती।
कुछ रिश्ते, कुछ रास्ते, कुछ फैसले, और कुछ अधूरी कहानियाँ… ये सब बस यूँ ही होते हैं।
और शायद हमें हर बार वजह ढूंढनी भी नहीं चाहिए।
कभी-कभी जीना भी तो… बस यूँ ही अच्छा लगता है।
@highlight
No comments:
Post a Comment