Thursday, January 14, 2021

selflessness Timelessness Egolessness

शाम होने ही वाली हैं। पास ही में एक तालाब है, धूप-छाया के विस्तार में बड़ी सुखद घड़ियां बीत रही हैं। तालाब को हवा के तेज थपेड़ों ने  बेचैन कर रखा हैं। लहरें उठ रही, गिर रही और कुछ ढूंढती हैं। 
फिर हवायें सो गईं और तालाब भी सो गया।
मेरे अंदर से एक आवाज़ आई - जो बेचैन होता है वह शांत भी हो सकता है। बेचैनी अपने में शांति को छिपाये हुए है। तालाब अब शांत है। तब भी शांत था। लहरें ऊपर ही थीं, भीतर पहले भी शांति थी।’ 
हम भी ऊपर ही अशांत है। लहरें ऊपर ही हैं। भीतर गहराई में मौन है। विचारों की हवाओं से दूर जाते ही अंदर सब शांत हो जाता है, विचारों ने जो कचरा फैलाया था वो अब दिखने लगता है। 
अब चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई पड़ने लगी हैं, चिड़िया पहले भी चहचाहा रही थी लेकिन विचारों ने यूं उलझाया था कि आवाज़ पहुंच नहीं पा रही थी।
विचारों के विदा होते ही हवाएं कानों में अब कुछ कहना चाहती हैं, कुछ याद दिला रही अपनी संगीत से ... आंखे बरबस ही बंद होते जा रही है, होठ फैलने लगा हैं, सांस लयबद्ध हो सुकून दे रही है।  और आंखो से एक बूंद गालों पर लुढ़क चला हैं। समय का बोध मिट चला हैं और इसके मिटते ही समय के पार - सेल्फ्लेसनेस और ईगोलेसनेस किसी भी प्रकार की परेशानियों के अस्तित्व को नाकार रहा है।

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