Wednesday, February 3, 2021

बची रहें मानवता

कायम रहें इमान बची रहें मानवता
 संबंधों की संवेदनशीलता
सब वैसे ही हो जैसे 
सुबह की ओस
 महुआ की महक
 पक्षियों की चहक
 भोर का उजाला
 सूरज भगवान की लालिमा
 गाय के बछड़े की पुकार
 ठंड, गर्मी बरसात, पतझड़
 और घर की ओर लौटते पशुओं की घंटी की आवाज़ 
बची रहे रात की नींद
 मधुर सपने 
सुबह का सुकून 
शाम की उदासी 
कायम रहे यह पहाड़
 झरने, जंगल, पेड़  नदियां और तालाब
नीचे पृथ्वी और ऊपर आसमान। 
और सब कुछ भुल जाने के बाद भी बची रहें वे  यादें! 
अविनाश पांडेय

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