कायम रहें इमान बची रहें मानवता
संबंधों की संवेदनशीलता
सब वैसे ही हो जैसे
सुबह की ओस
महुआ की महक
पक्षियों की चहक
भोर का उजाला
सूरज भगवान की लालिमा
गाय के बछड़े की पुकार
ठंड, गर्मी बरसात, पतझड़
और घर की ओर लौटते पशुओं की घंटी की आवाज़
बची रहे रात की नींद
मधुर सपने
सुबह का सुकून
शाम की उदासी
कायम रहे यह पहाड़
झरने, जंगल, पेड़ नदियां और तालाब
नीचे पृथ्वी और ऊपर आसमान।
और सब कुछ भुल जाने के बाद भी बची रहें वे यादें!
अविनाश पांडेय
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