Monday, October 28, 2019

The Brave win the Beauty. The Beauty win the Brave.

The brave wins the beauty. The beauty wins the brave.  :)

यह तो हमारा मानसिक पैटर्न है जो दुखो को फौरन अपने से रिलेट कर लेता है। दुख जो हमे ज्यादा सहज और सुविधाजनक मालूम पड़ते है, यही हमारी जीने का ढंग है,जिसे हम लोग जाने-अनजाने पोषित कर चुके है और करते चले जाते है।  
हम दुखो को, किसी भी प्रकार की नाकारात्मक्ता को पोषित कैसे करते है – बीते हुये समय की बुरी यादे, किसी ने धोखा दिया, किसी ने विश्वास को चोट किया, हमारी बार-बार की असफलता, हमारी परवरिश- माहौल से मिलने वाली निराशा इत्यादि सब मिल कर विचारो की एक जाल पैदा करते है और जीवन के लिए एक धारणा बनाते है। एक ऐसी धारणा जो निराशावादी-नकारात्मक एवं जो आने वाले कल के लिए एक डर पैदा करते है। 
कहते है अंधेरा, अंधेरों को आकर्षित करता है। फलस्वरूप हमारी धारनाए(auto-suggestions) जो डर-निराशा-बुरी-यादे,दुख,दर्द के आधार पर बनी हुयी है वह हमारी आने वाली कल और आज को भी अपने जाल मे जकड़ लेती है।     
 एक औसत मनुष्य का दिमाग अपनी रोज की जिंदगी मे, 24 घंटा मे लगभग 60000, विचार (thought) पैदा करता है। 60,000 विचारो मे लगभग 95%- 57,000 विचार हमारे भूतकाल – बीते हुये कल की बुरी यादे । भविष्यकाल यानि आने वाले कल से संबन्धित डर (fear) के होते है। सिर्फ 3,000 विचार हमारे आज के लिए होते है और यह 3000 विचार भी दबे-कुचले से छुपे हुये होते है । अब भला 57000 नकारात्मक शत्रुवों के सामने 3000 सकारात्मक विचार कब तक सकारात्मक रह सकते है। फलस्वरूप वह भी इन 3000 सकारात्मक विचारो को अपने रंग मे रंगना शुरू कर देते है। नतीजा यह होता है की हम जैसे है चाहे कितना भी बुरा उसे स्वीकार करते जाते है, जीते चले जाते है, यह लगभग वैसा ही होता है, जैसा वो मेढक जो हर बार पानी के बढ़ते तापमान पर अपने को एडजस्ट करते जाता है और जब पानी ज्यादा गरम हो जाता है तो फिर उसके पास इतनी भी एनर्जि नहीं बचती जिससे वो अपने-आप को बचा सके। हमारी भी इस समय की मनोस्थिति- भ्रांति (illusions) ऐसा ही होती है। हरेक बढ़ते दुखो को हम एडजस्ट करते जाते है और अंत मे अपने ही  नाकारात्मक्ता के कारण हम मारे जाते है।  शायद हम इससे बेहतर हो सकते थे पर यह हमारी ही बनाई नाकारात्मक्ता का जाल थी जो हमे बदतर के लिए भी एडजस्ट कराते चली गयी। कही कोई सकारात्मक योजनाए भविष्य के लिए नहीं बना पाये क्योकि हम इससे निकल कर कुछ सोच भी नहीं पाये। सोचते भी कैसे .......................................................................................................................
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           मेरी आने वाली किताब मे से कुछ अंश

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