Monday, October 28, 2019

जब सॉल्यूशन पास नहीं हो तो प्रॉब्लम से बचना चाहिए।

हाइहील पहनी हुई कोई लड़की यह नहीं बोल सकती की हाईहील पहन कर चलना आसान है। कई बार गिरना भी पड़ता है मगर लंबी दिखने की चाह और फ़ैशन बुरा फील नहीं होने देता। मैंने भी अपने लिए यही सिद्धान्त अपनाया था। हो सकता है कुछ डिफ़्रेंट चिजे करने से दिक्कत महसूस होती हो मगर यह फीलिंग भी कमाल की होती है, “यू आर डिफ़्रेंट फ्रम क्राउड़”।                                                                 
मेरी जिंदगी मुझे कभी यह विश्वास नहीं दिला सकी की कल मै तुम्हारे अनुसार ही चलूँगी या मैंने भी जिंदगी से कभी यह वादा नहीं किया की जो आज कर रहा हूँ वही कल करूंगा। क्या पता तुम कही नए रास्ते तलाश कर लो और मै उन पुराने रास्तो पर ही खड़ा रह जाऊ! मै सही या जिंदगी सही! कोई नहीं जानता की अच्छा क्या है और बुरा क्या है? कौन कर सकता है निश्चित? कल जब हम बच्चे थे तो हीरो को ही पसंद करते थे मगर समझ पैदा होते ही हम विलेन को भी समझना चाहते है।                                                        मैंने भी अपने को तभी समझा जब टुकड़ो-टुकड़ो मे बट चुका था। कभी इधर कभी उधर होता रहा था। अहंकार सर चढ़ कर बोलता था। किए हुये मूर्खतापूर्ण कामो से भीड़ मे मिलकर भीड़ का  समर्थन पाना चाहता था। बेलगाम इच्छाये मुझे बंदर की तरह नचाती थी। कभी उसी इच्छायों की आग मे जलते हुये अपने को आँसुओ की दलदल मे धंसा पता था और यही वो समय था जब मै अपने टुकड़ो को वापस से जोड़ते हुये जाना था की ‘अंधेरे से अंधेरा दूर नहीं किया जा सकता’। इसी समय यह अहसास हुआ था की हमारे जीवन की जटिलता एक बुनियादी बात से निर्मित होती है और वह बुनियादी बात यह है की- हम जो नहीं है वही दिखाने की कोशिस मे लग जाते है। खुद को श्रेष्ठ साबित करने के लिए ऐसे-ऐसे कार्य कर लेते है जो भविष्य मे मूर्खतापूर्ण साबित होते है।                                    
मैंने जिंदगी के उस फैलाव को भी देखा था जहा से मृत्यु सामने खड़ी हुई मेरे विल पावर की परीक्षा ले रही थी और उस परीक्षा मे फ़ेल होने का मतलब था ‘मृत्यु’! मानसिक स्तर पर भी मैंने अपने को चरम स्तर पर देखा! जहा पर मेरे अंदर रोग के लिए एक छोटी सी स्वीकार और डर मुझे मानसिक रोगी बना सकता था। काफी करीब तक पहुंचा भी था मगर मेरी नहीं डरने का सौगंध मेरे और मानसिक विकृतियो के बीच दीवार बन गई थी। उन दिनो मेरा यह विश्वास की “भाग्य भी साहसी का साथ देता है” और “हम लोग शायद इसलिए अटक जाते है क्योकि जिस दरवाजे को खींचना होता है उसे हम धकेल रहे होते है” ने मेरे लिए निर्णय लेने मे काफी सहायता किया था। इस विश्वास के कारण ही मै उस शक्तिशाली समय से भी आंखो मे आँख डाल कर मिलाया था जब मै भीतर से काफी दुर्बल हो चुका था। उस समय हर छोटी सी चीज़ या किसी द्वारा कहा गया छोटा शब्द भी काफी प्रभाव डाल देता था। मन तिलमिला जाता था मगर नित्से ने सही कहा था की जो चिजे आपको मारती नहीं वही चिजे आपको मजबूत बनाती है। मैं भी  कमजोर पलो मे मुझे दुखी करने वाले क्रियाओ को बिना प्रतिकृया के सह लेता था।  मैंने सुन रखा था की बुरे समय मे तुरंत-तुरंत प्रतिकृया से बचनी चाहिए और कम बोलते हुये ‘जब सोल्यूशंस पास नहीं हो तब प्रोब्लेम से बचना चाहिए’। मैने भी वही किया था।.....
                                              
                                    ..... मेरी आने वाली बूक से

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